विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २९३ वे सबके गुलाम हैं। किन्तु जिन्होंने प्रभुपर विश्वास करके आशाको जीत लिया है, वे केवल भगवान्के सेवक हैं—ईश्वर-भक्त हैं ॥४॥ मुझमें भजन- भावका एक भी आचरण नहीं है, इसीसे विनती करता हूँ कि हे नाथ ! आप अपने नामके नाते इस तुलसीदासपर कृपा कीजिये ॥५॥ [ १६९ ] जो मोहिं राम लागते मीठे । तौ नवरस षटरस-रस अनरस् ह्वै जाते सब सीठे ॥१॥ बंचक विषय विविध तनु धरि अनुभवे सुने अरु डीठे । यह जानत हौं हृदय आपने सपने न अघाइ उबीठे ॥२॥ तुलसिदास प्रभु सों एकहि बल वचन कहत अति ढीठे। नामकी लाज राम करुनाकर केहि न दिये कर चीठे ॥३॥ शब्दार्थ—सीठे = सीठीकी तरह, निस्तत्त्व, रस-रहित । डीठे = देखे । उबीठ = उबिठ गया, जो भर गया, ऊब गया । ढीठे = ढिठाई । भावार्थ—यदि मुझे रामजी अच्छे लगते, तो नवरस और षड्रसके रस नीरस और निस्तत्त्व जँचते ॥१॥ मैंने नाना प्रकारके शरीर धारणकर यह अनु- भव किया है, (लोगोंसे) सुना है, और (अपनी आँखोंसे) देखा है कि (पाँचों) विषय (भारी) ठग हैं। यद्यपि इसे मैं अपने दिलमें समझता हूँ (कि ये ठग हैं) तथापि उनसे अघाकर (तृप्त होकर) स्वप्नमें भी मेरा जी नहीं ऊबा ॥२॥ तुलसीदास अपने स्वामीसे एक ही बलपर बड़ी ढिठाईसे बातें कह रहा है; (वह यह कि) करुणाकी खानि श्रीरामजीने अपने नामकी लाज रखनेके लिए किसके हाथमें चिट्ठी या परवाना नहीं दिया ? अर्थात् किसे मुक्त कर देनेका वचन नहीं दिया ? कहनेका आशय यह है कि आपका जो ऐसा स्वभाव है, उसीका मुझे पूर्ण भरोसा है ॥३॥ विशेष १—'नवरस'—शृंगार, हास्य, करुण, वीर, रौद्र, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शान्त ये नव-रस साहित्यमें माने गये हैं ।