भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 303

२९२ विनय-पत्रिका मछली गंगाजीमें जल-प्रवाहके सामने जाती है, पर इतना बड़ा हाथी उसमें बह जाता है ॥२॥ जैसे बालूमें चीनीके मिल जानेपर उसे बलपूर्वक कोई अलग नहीं कर सकता; किन्तु उसका रस जाननेवाली छोटी चींटी उसे बिना प्रयास ही पा जाती है ॥३॥ उसी प्रकार जो योगी सब दृश्योंको अपने पेटमें रखकर निद्राको त्यागकर सोता है, वही द्वैतका घोर विरोधी हरिचरणोंमें परम सुखका अनुभव करता है ॥४॥ न तो वहाँ देश-काल है और न शोक, मोह, भय, हर्ष और दिन-रात ही है। तुलसीदास कहते हैं कि यह दशा प्राप्त हुए बिना संशयोंका मूलोच्छेद नहीं होता ॥५॥ [ १६८ ] जो पै राम-चरन-रति होती। तौ कत त्रिबिध सूल निसिबासर सहते विपति निसौती ॥१॥ जो संतोष सुधा निसिवासर सपनेहुँ कबहुँक पावै। तौ कत विषय बिलोकि झूठ जल मन-कुरंग ज्यों धावै ॥२॥ जो श्रीपति-महिमा विचारि उर भजते भाव बढ़ाए। तौ कत द्वार-द्वार कूकर ज्यों फिरते पेट खलाए ॥३॥ जे लोलुप भये दास आस के ते सबही के चेरे। प्रभु-विस्वास आस जीती जिन्ह, ते सेवक हरि केरे ॥४॥ नहिं एकौ आचरन भजन को, विनय करत हौं ताते। कीजै कृपा दास तुलसी पर, नाथ नाम के नाते ॥५॥ शब्दार्थ-निसौती = शुद्ध, खालिस। कुरंग = हरिण। खलाये = पचकाकर, खलाकर । चेरे = दास । भावार्थ-यदि रामजीके चरणोंमें प्रेम होता, तो रात-दिन तीनों (दैहिक, दैविक, भौतिक) दुःख शुद्ध विपत्ति क्यों सहते ? ॥१॥ यदि रातमें, दिनमें अथवा स्वप्नमें भी सन्तोषामृत मिल जाय, तो यह मन-कुरंग मृग-जलरूपी विषयोंको देखकर क्यों दौड़े ? ॥२॥ यदि हम लक्ष्मीनारायणकी महिमाको हृदयमें विचारकर भाव बढ़ाकर उन्हें भजते, तो कुत्तेके समान पेट पचकाये द्वार-द्वार क्यों फिरना पड़ता ? ॥३॥ जो लोग लोलुप हैं, आशाके दास हैं,