विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २९१ रघुनाथजी ! आपने उसका प्रेम समझकर दर्शन दिया और उद्धार कर दिया ॥६॥ बानर सुग्रीव अपने भाई वालिके भयसे व्याकुल होकर पुकारता हुआ शरणमें आया । आप भक्त सुग्रीवका दारुण दुःख न सह सके और गालियाँ सहकर वालिको मारा ॥७॥ शत्रु (रावण) का भाई विभीषण राक्षस था; भला वह भगवद्भजनका कौन-सा अधिकारी था ? किन्तु ज्यों ही वह शरणमें गया, आपने अगवानी करते हुए भुजा पसारकर उसे भेटा ॥८॥ बानर और रीछ ऐसे विकारी हैं कि उनका स्मरण करनेसे (देखनेको कौन कहे) अशुभ होता है । किन्तु वेदोंमें विदित है कि आपने उन सबको भी पवित्र कर दिया—हे नाथ ! यह तुम्हारी ही महिमा है ॥९॥ कहाँतक कहूँ, जिन दीनोंकी आपने विपत्तियाँ दूर की हैं वे असंख्य हैं । फिर कलिकालके पापोंसे ग्रसित इस तुलसीदासपर कृपा करना आप क्यों भूल गये नाथ १६७ ] रघुपति-भगति करत कठिनाई । कहत सुगम करनी अपार जानै सोइ, जेहि बनि आई ॥१॥ जो जेहि कला कुसल ताकहँ, सोइ सुलभ सदा सुखकारी । सफरी सनमुख जल-प्रबाह सुरसरी बहै गज भारी ॥२॥ ज्यों सर्करा मिलै सिकता महँ, बलतें न कोउ बिलगावै । अति रसग्य सूच्छम पिपीलिका, बिनु प्रयास ही पावै ॥३॥ सकल दृस्य निज उदर मेलि, सोवै निद्रा तजि जोगी । सोइ हरिपद अनुभवै परम सुख, अतिसय द्वैत-वियोगी ॥४॥ सोक मोह भय हरष दिवस-निसि देस-काल तहँ नाहीं । तुलसिदास यहि दसाहीन संसय निरमूल न जाहीं ॥५॥ शब्दार्थ—सफरी = मछली । सर्करा = चीनी । सिकता = बालू । पिपीलिका = चींटी । द्वैत-वियोगी = जिसे द्वैत भावसे वियोग हो गया हो । भावार्थ—रामभक्ति करनेमें बड़ी कठिनाई है। कहनेमें तो सुगम है, पर करना अपार है। वही जानता है, जिससे करते बन गया ॥१॥ जो जिस कलामें कुशल रहता है, उसके लिए वही सुलभ और सदा सुखकर है। देखिये न,