भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 301

२१० विनय-पत्रिका बिहँग जोनि आमिष अहार पर, गीध कौन व्रतधारी। जनक-समान कृपा ताकी निज कर सब भाँति सँवारी ॥५॥ अधम जाति सबरी जोषित जड़, लोक-बेद तें न्यारी। जानि प्रीति, दै दरस कृपानिधि, सोउ रघुनाथ उधारी ॥६॥ कपि सुग्रीव बंधु-भय-व्याकुल, आयो सरन पुकारी। सहि न सके दारुन दुख जनके, हत्यो बालि, सहि गारी ॥७॥ रिपु को अनुज बिभीषन निसिचर, कौन भजन अधिकारी। सरन गये आगे ह्वै लीन्हों भेंट्यो भुजा पसारी ॥८॥ असुभ होइ जिन्हके सुमिरे ते बानर रीछ बिकारी। बेद-बिदित पावन किये ते सब, महिमा नाथ ! तुम्हारी ॥९॥ कहँ लगि कहौं दीन अगनित जिन्हकी तुम बिपति निवारी। कलिमल-ग्रसित दास तुलसी पर, काहे कृपा बिसारी ॥१०॥ शब्दार्थ—वपु = शरीर। आमिष = मांस। जोषित = स्त्री। निवारी = दूर किया। भावार्थ—रामजी दीनोंका ऐसा (जैसा कि पिछले पदमें कहा गया है और आगे कहा जायगा) हित करनेवाले हैं। वह बड़े ही कोमल, करुणा-निधान और बिना कारण ही परोपकार करनेवाले हैं ॥१॥ साधनोंसे रहित, दीन और अपने पापके कारण गौतम-पत्नी अहल्या शिला हो गयी थी। उसे आपने घरसे प्रस्थान करके अपने पवित्र चरणोंसे छूकर घोर पापसे मुक्त कर दिया ॥२॥ हिंसा करनेमें रत और तामसी शरीरवाला निषाद पशुओंके समान वनमें घूमा करता था। उसे आपने प्रेमके वशमें होकर हृदयसे लगाकर भेंटा—जरा भी जाति-पाँतिका विचार नहीं किया ॥३॥ यद्यपि इन्द्रके पुत्र जयन्तने आपसे इतना बड़ा द्रोह किया था कि कहा नहीं जा सकता, तथापि जब वह सब लोकोंमें देख आनेके (कहीं शरण न मिलनेके) बाद शोक-हत होकर आपकी शरणमें गया, तो आपने उसका भय दूर कर दिया ॥४॥ पक्षी योनि और मांसहारी गीध ही कौन-सा व्रतधारी था ? किन्तु उसका अन्त्येष्टि-संस्कार आपने पिताके समान अपने हाथसे किया और उसका हर तरहसे सब काम बना दिया ॥५॥ नीच जातिकी स्त्री शबरी मूर्खा और लोक-वेदसे पृथक् थी। किन्तु हे कृपानिधान