विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 300, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २८९ घूमे, पर उसकी आपने कभी चर्चातक न चलायी; पर बारम्बार गीध और शबरीके प्रेमका वर्णन करना आपको प्रिय है ॥३॥ कुत्तेके कहनेसे तो यतिको (तीर्थसिद्ध नामक ब्राह्मणको) हाथीपर चढ़ाकर नगरके बाहर निकाल दिया, किन्तु स्त्री-(जानकीजी) की निन्दा करनेवाले मन्दबुद्धि धोबीको अपनी प्रजा समझकर नीतिसे नगरमें बसाया ॥४॥ इस (आपके) दरबारमें दीनोंका आदर करनेकी रीति सदासे चली आ रही है। किन्तु हे दीनदयालु ! आपको इस दीन तुलसीकी सुध किसीने नहीं करायी ॥५॥ विशेष १—‘केवट’—१०६ पदके विशेषमें देखिये । २—‘कौनप’—वियोगी हरिने इसका अर्थ लिखा है ‘राजा’ । ३—‘कियो सकल सँग भाई’—इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि “भाईके समान सबका साथ किया।” वियोगी हरिने ‘भाई’ का अर्थ “भाई-चारा निवाहा” लिखा है। ४—‘गीध’—२१५ पदके विशेषमें देखिये । ५—‘सबरी’—१०६ पदके विशेषमें देखिये । ६—‘स्वान’—१४६ पदके ‘विशेष’ विवरणमें देखिये । तीर्थसिद्ध नामक ब्राह्मण हाथीपर चढ़ाकर बड़े समारोहके साथ कालिंजरका महन्त बनाया गया था । [१६६] ऐसे राम दीन-हितकारी । अति कोमल करुनानिधान बिनु कारन पर-उपकारी ॥१॥ साधन-हीन, दीन, निज अघ-बस, सिला भई मुनि-नारी । गृह तैं गवनि परसि पद पावन घोर साप तें तारी ॥२॥ हिंसारत निषाद तामस वपु, पसु-समान बनचारी । भेंट्यो हृदय लगाइ प्रेमबस, नहिं कछु जात विचारी ॥३॥ जद्यपि द्रोह कियो सुरपति-सुत, कहि न जाय अति भारी । सकल लोक अवलोकि सोकहत, सरन गये भय टारी ॥४॥ १९