भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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२८८ विनय-पत्रिका भक्ति पैदा न हुई, तो तेरी माताने तुझ जड़को व्यर्थ ही पैदा करके अपनी युवावस्था खोयी ॥७॥ विशेष १—'घर गुरु......'सासुरे'—इसका अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है:— "गुरुके घर, प्रियजनोंके यहाँ तथा ससुरालमें"। २—'केवट मीत' 'बड़ाई' इसका अर्थ करनेमें वियोगी हरिजी गहरा गोता खा गये हैं। आप लिखते हैं, "किन्तु जब केवट आपको अपना मित्र एवं बन्दर अपना 'भाई' कहते हैं, तो अपनी बड़ाई समझते हैं।" [ १६५ ] रघुबर रावरि यहै बड़ाई । निदरि गनी आदर गरीब पर, करत कृपा अधिकाई ॥१॥ थके देव साधन करि सब, सपनेहु नहिं देत दिखाई । केवट कुटिल भालु कपि कौनप, कियो सकल सँग भाई ॥२॥ मिलि मुनिवृंद फिरत दंडक बन, सो चरचौ न चलाई । वारहि वार गीध सबरी की, वरनत प्रीति सुहाई ॥३॥ स्वान कहे तें कियो पुर बाहिर, जती गयंद चढ़ाई । तिय-निन्दक मतिमंद प्रजा रज, निज नय नगर वसाई ॥४॥ यहि दरबार दीन को आदर, रीति सदा चलि आई । दीनदयालु दीन तुलसी की, काहु न सुरति कराई ॥५॥ शब्दार्थ—निदरि = निरादर करके । गनी = धनी । कौनप = राक्षस (विभीषण) । नय = नीति । भावार्थ—हे रघुकुलमें श्रेष्ठ रामजी ! आपकी यही बड़ाई है कि आप धनी पात्रोंका निरादर और गरीबोंका आदर करके उनपर अधिक कृपा करते हैं ॥१॥ देवता सब साधन करके थक गये, पर उन्हें आपने स्वप्नमें भी दर्शन नहीं दिया । किन्तु केवट, कुटिल भालु, बन्दर और राक्षस (विभीषण) आदिका साथ किया और वे आपको बहुत भाये ॥२॥ मुनियोंके साथ मिलकर दंडक वनमें