विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 298, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २८७ सहज सरूप कथा मुनि बरनत रहत सकुचि सिर नाई । केवट-मीत कहे सुख मानत वानर-बंधु बड़ाई ॥५॥ प्रेम-कनौड़ो राम सो प्रभु त्रिभुवन तिहुँकाल न भाई । तेरो रिनी हौं कह्यो कपि सों ऐसी मानिहि को सेवकाई॥६॥ तुलसी राम सनेह-सील लखि, जो न भगति उर आई । तौ तोहिं जनमि जाय जननी जड़ तनु-तरुनता गँवाई ॥७॥ शब्दार्थ—हाते = पृथक् । फलनिकी = फलोंकी, बेरोंकी । कनौड़ो = कृतज्ञ । जाय = व्यर्थ । भावार्थ—प्रीतिकी रीति श्रीरामजी जानते हैं। श्रीरामजी सब नातों-रिश्तोंको दूर रखकर स्त्री स्नेह-सम्बन्ध रखते हैं ॥१॥ महाराज दशरथने स्नेहका निर्वाह करनेमें अपना शरीर त्यागकर कीर्त्ति स्थापित की; किन्तु रामजीके गुणोंकी गरिमा यह है कि उन्होंने ऐसे (स्नेही) पितासे भी अधिक ममता गीध (जटायु) पर दिखायी ॥२॥ सुग्रीव सखाको स्त्रीके विरहमें देखकर (रामजीने) अपनी अर्द्धाङ्गिनी महारानी जानकीजीको भुला दिया। रणभूमिमें तो भाई लक्ष्मण (मूर्च्छित) पड़े थे, पर आपके हृदयमें विभीषणका ही सोच अधिक था ॥३॥ घरमें, गुरुके यहाँ, प्रियजनोंके यहाँ, ससुरालमें तथा और जब-जब जहाँ कहीं मेहमानी हुई तब-तब वहाँ शबरीके बेरोंकी चर्चा करते हुए कहा कि वैसा स्वाद और माधुर्य कहीं नहीं मिला ॥४॥ जब मुनि लोग आपके सहज स्वरूप (ईश्वरीय स्वरूप) का वर्णन करते हैं, तब तो आप संकोचके मारे सिर झुका लेते हैं; किन्तु केवटके मित्र कहनेपर आप आनन्दित हो जाते हैं और बानरोंके बन्धु कहे जाने- में आप अपनी बड़ाई समझते हैं। अर्थात् जब मुनि लोग आपको सच्चिदानन्द स्वरूप कहते हैं, तब तो आप सकुच जाते हैं पर जब वे यह कहते हैं कि आप केवट (निषाद) के सखा हैं और वानरोंके बन्धु हैं, तब आप आनन्दित हो जाते हैं—इसमें अपनी बड़ाई समझते हैं॥५॥ हे भाई ! तीनों लोक और तीनों कालमें रामजीके समान प्रेम-परवश होनेवाला स्वामी दूसरा कोई नहीं है। (रामने) हनूमान्जीसे कहा कि 'मैं तेरा ऋणी हूँ; भला ऐसी सेवकाई कौन मानेगा ?' अर्थात् सेवककी सेवाओंपर इस प्रकार कृतज्ञता कौन प्रकट करेगा ? ॥६॥ हे तुलसी ! रामजीका स्नेह और शील देखकर भी यदि तेरे हृदयमें उनके प्रति