विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 297, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें२८६ विनय-पत्रिका इसमें कविका यह आशय है कि हे प्रभो, एक तो मेरे पास कुछ देनेके लिए है ही नहीं, दूसरे यदि मैं सुदामाके चावलकी तरह माँग-जाँच कर कोई छोटी-मोटी वस्तु आपको दूँ भी तो सुदामाके अतिरिक्त आपके लेनेका एक और उदाहरण हो जायगा। किन्तु गोस्वामीजी महाराज ! आप भूल कर रहे हैं। दशरथके लाड़ले भी यों ही कुछ देनेवाले नहीं हैं। सुग्रीव और विभीषणको ही उन्होंने कौन-सा बिना कुछ लिये ही अयाच्य कर दिया था ? और कुछ नहीं तो सेवा ही ली थी। वह हर अवतारमें भक्तोंके समक्ष पेट धोये बैठे रहते हैं। २—'कपि'—अन्यान्य टीकाकारोंने इस शब्दका अर्थ ही छोड़ दिया है। यह सुग्रीवके अतिरिक्त अन्यान्य बन्दरोंके लिए आया है। यहाँपर यह प्रश्न किया जा सकता है कि कपिमें तो सुग्रीव भी आ गये, फिर अलगसे सुग्रीवका नाम लिखनेकी क्या आवश्यकता थी ? उत्तरमें इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि सुग्रीव राजा था, इसलिए उसके नामका अलगसे उल्लेख करना सर्वथा उचित है। इसी प्रकार रामायणमें सुग्रीवने भी रामसे कहा है—'हरि लीन्हेसि सरबस अरु नारी'। अर्थात् वालिने मेरा सर्वस्व तो हरण कर ही लिया, स्त्री भी छीन ली। तात्पर्य यह कि स्त्रीका छीन लेना घोर अन्याय है। वियोगी हरिजीने भी 'कपि' शब्दका अर्थ लिखना जरूरी नहीं समझा। ३—'सबरी'—१०६ पदके विशेषमें देखिये। [ १६४ ] जानत प्रीति-रीति रघुराई। नाते सब हाते करि राखत, राम सनेह-सगाई ॥१॥ नेह निबाहि देह तजि दशरथ, कीरति अचल चलाई। ऐसेहु पितु तें अधिक गीधपर ममता गुन गरुआई ॥२॥ तिय-बिरही सुग्रीव सखा लखि प्रान-प्रिया बिसराई। रन पर्यो बंधु विभीषण ही को, सोच हृदय अधिकाई ॥३॥ घर गुरु गृह प्रिय-सदन सासुरे भइ जब जहाँ पहुँनाई। तब तहँ कहि सबरी के फलनिकी रुचि माधुरी न पाई ॥४॥