विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २८५ हरिहु और अवतार आपने, राखी वेद-बड़ाई । लै चिउरा निधि दई सुदामहिं, जद्यपि बाल-मिताई ॥३॥ कपि सबरी सुग्रीव बिभीषन, को नहिं कियो अजाची । अब तुलसिहि दुख देति दयानिधि दारुन आस-पिसाची ॥४॥ शब्दार्थ—सकृत = एक बार । चिउरा = चिवड़ा, कूटा हुआ धान । निधि = सम्पत्ति । भावार्थ—यह सही है कि दानियोंमें शिरोमणि एक ही है। जिस किसीने उससे याचना की, उसे ही याचनाके कारण फिर बहुत नाच नाचना न पड़ा, पूर्णकाम हो गया ॥१॥ दैत्य, देवता, मनुष्य, मुनि सब स्वार्थी हैं, बिना कुछ पाये कोई कुछ नहीं देता । केवल कोशलपाल श्रीरामजी ही ऐसे कृपालु कल्पवृक्ष हैं जो एक बार मस्तक नवाते (प्रणाम करते) ही पिघल जाते हैं ॥२॥ यद्यपि हे नाथ, आपने भी अपने और अवतारोंमें वेदोंकी बड़ाईकी रक्षा की है; (कृष्णावतारमें) बचपनकी मित्रता रहनेपर भी चिवड़ा लेकर सुदामाको सम्पत्ति दी है (मुफ्त नहीं) ॥३॥ किन्तु (रामावतारमें आपने) बन्दर, शबरी, सुग्रीव, विभीषण आदि- मेंसे किसे नहीं अयाच्य कर दिया, अर्थात् बिना कुछ लिये किसका मनोरथ पूरा नहीं किया ? हे दयानिधि ! अब भयंकर आशारूपी पिशाचिनी तुलसीदासको दुःख दे रही है ॥४॥ विशेष १—'लै चिउरा···मिताई'—इसमें बड़ा ही मीठा व्यंग्य है । कुछ लोगोंकी यह धारणा है कि गुसाईंजीने यहाँ पक्षपात किया है; इसीसे रामावतार को कृष्णावतारसे अधिक उदार दिखाया है। किन्तु वास्तवमें यहाँ बात ही कुछ और है। क्योंकि यहाँ रामको अधिक उदार ठहरानेपर "ऐसी कौन प्रभुकी रीति" (पद संख्या २१४) में कृष्णको ही अधिक उदार मानना पड़ेगा । यहाँपर कविने कृष्णके बहाने रामको कहा है कि 'हरिहु और अवतार आपने राखी वेद बड़ाई।' राम और कृष्णमें कविकी अभेद दृष्टि है (विनयपत्रिकाका २१४ वाँ पद देखिये) । ग्रन्थकारकी इस उक्तिपर भगवान् अवश्य ही हँस पड़े होंगे। उन्हें यह सोचकर हँसी आयी होगी कि यहाँपर कवि 'सिर काटे और बालकी रक्षा करे' वाली कहावत को बड़े मजेदार ढंगसे चरितार्थ कर रहा है।