विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ विनय-पत्रिका करके नहीं समझा, अर्थात् यह न समझा कि उन्हें बहुत बड़ी वस्तु दी जा रही है ॥२॥ जो सम्पत्ति रावणने अपने दसों सिर अर्पित करनेके बाद शिवजीसे प्राप्त की थी, वह सम्पत्ति हे हरे ! आपने विभीषणको बड़े संकोचके साथ दी थी। (अर्थात् आपने यह समझा कि विभीषणको बिलकुल साधारण चीज दी जा रही है) ॥३॥ तुलसीदास कहते हैं कि रे मेरे मन ! जो तू सब तरहसे सब सुख चाहता है, तो श्रीरामजीका भजन कर—ताकि कृपानिधि रामजी तेरा सब काम पूरा करें ॥४॥ विशेष १—'जो गति....जिय जानी'—यही बात भगवान् श्री रामजीने शबरी- से कही है :— जोगि वृन्द दुरलभ गति जोई। तो कहँ आजु सुलभ भइ सोई॥ मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज स्वरूपा॥ —रामचरितमानस २—'दससीस अरपि'—एक बार रावणने कैलास पर्वतपर घोर तपस्या की थी। अन्तमें वह अपना सिर काट-काटकर अग्निमें हवन करने लग गया था। जब नौ सिर काट चुका और दसवाँ सिर काटनेके लिए तलवार उठायी, तब शिवजी प्रकट हुए और प्रसन्न होकर उससे वर माँगनेके लिए कहा। फल-स्वरूप उसे लंकाका राज्य मिला। इसपर यह प्रश्न किया जा सकता है कि रावणने तो नौ सिर काटे थे, फिर गोस्वामीजीने दस सिर क्यों लिखा ? इसका उत्तर यह है कि वह अपने दसों सिर अर्पित कर चुका था। नौ सिर काटनेके बाद ही शिवजी प्रकट हो गये। इसीसे गोस्वामीजीने 'दससीस अरपि' लिखा है—'दससीस काटि' नहीं लिखा। [ १६३ ] एकै दानि-सिरोमनि साँचो। जोइ जाच्यो सोइ जाचकताबस, फिरि बहु नाच न नाचो ॥१॥ सब स्वारथी असुर सुर नर मुनि कोउ न देत बिनु पाये। कोसलपालु कृपालु कलपतरु, द्रवत सकृत सिर नाये ॥२॥