भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 294

विनय-पत्रिका २८३ सकता है ? किन्तु हे महाराज दशरथके लाड़ले ! आपके राज्यमें बिना जोते-बोये ही लोगोंने (फसल) काटी है, अर्थात् बिना सत्कर्म किये ही मुक्ति पायी है । विशेष १—'कोतो'—वियोगी हरिजीने शब्दार्थमें 'तो' का अर्थ 'था' लिखा है । यह अर्थ भी बेजा नहीं है, पर वास्तवमें यहाँ 'को' का अर्थ 'कौन' और 'तो' का अर्थ 'तुम्हारा', या 'तुम' अधिक संगत जँचता है; अथवा 'कोतो' शब्दको बंगीय प्रयोग मानकर 'कितना' अर्थ भी किया जा सकता है । इसके सिवा 'तो' का अर्थ 'तो' भी होता है । २—'लयो······जोतो'--वियोगी हरिजीने इसका अर्थ किया है,—'बिना ही जोते-बोये पाया है ।' खूब ! राग सोरठ [ १६२ ] ऐसो को उदार जग माँहीं । बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर राम सरिस कोउ नाहीं ॥१॥ जो गति जोग विराग जतन करि नहिं पावत मुनि ग्यानी । सो गति देव गीध सबरी कहँ प्रभु न बहुत जिय जानी ॥२॥ जो संपति दससीस अरपि करि रावन सिव पहँ लीन्हीं । सो संपदा विभीषन कहँ अति सकुच-सहित हरि दीन्हीं ॥३॥ तुलसिदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो । तो भजु राम, काम सब पूरन करैं कृपानिधि तेरो ॥४॥ शब्दार्थ—द्रवै=कृपा करें। सरिस=समान । भावार्थ—संसारमें ऐसा उदार कौन है, जो बिना सेवाके ही दीनोंपर द्रवित हो ? (ऐसा उदार) रामजीके समान दूसरा कोई नहीं है ॥१॥ जिस गति- को मुनि और ज्ञानीजन योग, वैराग्य आदि यत्न करनेपर भी नहीं पाते, उस गतिको हे प्रभो ! आपने गीध, शबरी आदिको देनेमें भी अपने हृदयमें बहुत