भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 293

२८२ विनय-पत्रिका महिमा जानकर रट लगाते हैं, वे तो तर ही जाते हैं, जो लोग बिना जाने ही अभ्यासी बन जाते हैं—वे भी नरकमें नहीं पड़ते। अर्थात् राम-नामके जपसे नासमझ लोग भी नामकी महिमाके कायल हो जाते और भव-सागरसे पार हो जाते हैं। राग मलार [ १६१ ] तो सों प्रभु जो पै कहूँ कोउ होतो । तौ सहि निपट निरादर निसिदिन, रटि लटि ऐसो घटि को तो ॥१॥ कृपा-सुधा-जलदान माँगिबो कहौँ सो साँच निसोटो । स्वाति-सनेह-सलिल-सुख चाहत चित-चातक सो पोतो ॥२॥ काल-करम-बस मन कुमनोरथ कबहुँ कबहुँ कछु भो तो । ज्यों मुदमय बसि मीन वारि तजि उछरि भभरि लेत गोतो ॥३॥ जितो दुराव दासतुलसी उर क्यों कहि आवत ओतो । तेरे राज राय दसरथ के, लयो वयो बिनु जोतो ॥४॥ शब्दार्थ—निसोटो = सच्चा, निराला। पोतो = बच्चा। भभरि = डरकर। ओतो = उतना। लयो = लवाई, खेतोंकी फसल काटी है। भावार्थ—हे प्रभो ! यदि आपके समान कहीं कोई होता, तो ऐसा कौन क्षुद्र है जो निपट (अत्यधिक) निरादर सहकर रातदिन आपकी रट लगाकर लटता (थकता या दुर्बल होता) ? मेरा जो कृपारूपी अमृत-जल आपसे माँगना है, वह सत्य कहता हूँ कि निराला है। मेरा चित्तरूपी चातकका बच्चा स्नेहरूपी स्वाति नक्षत्रका आनन्दरूपी जल चाहता है ॥२॥ काल और कर्मके प्रभावसे यदि कभी-कभी मेरे मनमें बुरी वासना आती है तो वह इसी तरह है जैसे मछली आनन्दके साथ रहती हुई जल छोड़कर उछलती और डरकर फिर (पानीमें) गोता लगा जाती है। (यहाँ कुत्सित वासनाओंका उदय होना ही मछलीका उछलना है, और फिर अपनी निष्ठाका ग्रहण करना ही मछलीका डरकर गोता लगाना है) ॥३॥ तुलसीदासके हृदयमें जितना कपट है उतना क्योंकर कहा जा