भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 292

विनय-पत्रिका २८१ व्याध गनिका गज अजामिल साखि निगमनि भने। और अधम अनेक तारे जात कापै गने ॥२॥ जानि नाम अजानि लीन्हे नरक जमपुर मने। दास तुलसी सरन आयो, राखिये आपने ॥३॥ शब्दार्थ—बानक = व्यापारी। निगम = वेद। भने = कहे हैं। मने = मनाही। भावार्थ—हे हरे ! मैंने सुना है कि तुम पतित-पावन हो। इसलिए मैं पापी हू और तुम पापियोंको पवित्र करनेवाले हो, दोनों (एक-दूसरेके खूब) बानक (व्यापारी) बन गये। अर्थात् मुझे पतित-पावनकी जरूरत है और तुम्हें पतित- की। मेल खूब मिला ॥१॥ वेदोंने कहा है कि (धर्म नामक) व्याध, गणिका (पिंगला वेश्या), गजेन्द्र और अजामिल (इस बातके) साक्षी हैं (कि तुम पतित- पावन हो)। तुमने और भी बहुत-से अधमों-(पापियों) को तारा है, भला वे किससे गिने जा सकते हैं ? ॥२॥ जानकर या बिना जाने तुम्हारा नाम लेनेसे यमराजकी पुरी नरकमें जानेकी मनाही कर दी जाती है। अतः यह सेवक तुलसीदास आपकी शरणमें आया है, इसे अपनी शरणमें रख लीजिये ॥३॥ विशेष १—'व्याध'—वियोगी हरिजी तथा अन्यान्य टीकाकारोंने इस शब्दसे 'वाल्मीकि' अर्थ निकाला है। किन्तु गणिका, गजेन्द्र और अजामिलकी श्रेणीमें महर्षि वाल्मीकि नहीं आ सकते। अजामिल इत्यादि घोर पापी थे, उनके पिछले जन्मके किसी कर्मका फल उदय हुआ और वे एक बार भगवान्‌का नाम मुखसे निकलते ही तर गये; किन्तु वाल्मीकिको अपना कुत्सित मार्ग छोड़कर अनन्त कालतक तपस्या करनेकी आवश्यकता पड़ी थी। अतः गणिका अजामिल आदिकी श्रेणीमें 'व्याध' का अर्थ 'वाल्मीकि' न करके 'धर्म' नामक व्याध अर्थ करना ही संगत प्रतीत होता है। क्योंकि धर्म नामक व्याधको भी उसी प्रकार गति मिली थी, जिस प्रकार गणिका, गजेन्द्र और अजामिलको। २—'गनिका'—पिंगला; ९४ पदके विशेषमें देखिये। ३—'अजामिल'—५७ पदके विशेषमें देखिये। ४—'जानि……मने'—इसका आशय यह है कि जो लोग राम-नामकी