विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० विनय-पत्रिका कपटका कर्त्तव्य खूब ठोस है ॥२॥ मैं कुसंगीहीसे तो प्रेम करता हूँ और साधु- संगतिसे क्रोध । (मेरी यह मूर्खता ठीक वैसी ही है) जैसे खरगोश सियारकी सेवा करके सिंहका यश चाहता है। भाव यह है कि जैसे सिंहकी कीर्त्तिके लोभमें पड़कर खरगोश सेवा ही करते-करते सियारका भक्षण बन जाता है, उसी प्रकार जो मनुष्य कुसंगमें पड़कर कीर्त्ति कमाना चाहता है, उसका भी सर्वनाश हो जाता है—कीर्त्ति तो दूर रही ॥३॥ शिवजीका उपदेश है कि ‘जीभसे नित्य राम-नामकी रट लगाया कर । क्योंकि कलियुगमें दम्भसे भी (नाम लेनेपर) नामरूपी अगस्त्य सोचरूपी समुद्रको सोख लेता है ॥४॥ रामनाम अत्यन्त अनु- कूल तथा आनन्द और कल्याणकी जड़ है, अपना (शिवजीका) यही निष्कर्ष है।’ रामनामका ऐसा प्रभाव सुनकर तुलसीदासको भी परम सन्तोष है ॥५॥ विशेष १—‘दम्भ हू......सोसु’—वास्तवमें नियमित रूपसे राम-नामकी रट लगानेकी ऐसी ही महिमा है। बहुतोंकी यह धारणा है कि जबतक अन्तःकरण शुद्ध नहीं हो जाता, मनमें एकाग्रता नहीं आ जाती, तबतक ‘राम-राम’ कहकर चिल्लानेसे कुछ नहीं होता। किन्तु ऐसा कथन शुष्क और तार्किक ज्ञानियोंका है। सचमुच ही राम-नामकी ऐसी महिमा है कि नियमित रूपसे छ महीने- तक प्रतिदिन कमसे कम तीन घण्टा राम-नामकी रट लगानेपर प्रत्येक मनुष्यका अन्तःकरण शुद्ध होकर मन स्थिर हो सकता है। यही तो राम-नामकी अपूर्वता है। परीक्षा करनेवालोंको ही इसकी सत्यताका पता चल सकता है। इस युगमें सबसे उत्तम और सरल साधन यही है। २—‘निरजोसु’—का अर्थ वियोगी हरिजीने ‘निश्चय’ लिखा है। पता नहीं कि यह अर्थ कैसे निकाला है। वास्तवमें इसका अर्थ है ‘निष्कर्ष’ यह शब्द ‘निर्यूष’ का अपभ्रंश है। [ १६० ] मैं हरि पतित-पावन सुने । मैं पतित तुम पतित-पावन दोउ बानक बने ॥१॥