भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 290

विनय-पत्रिका २७९ आशाकी डोरी डालकर नचा रहा है। (इतनेपर भी मैं) पण्डितोंकी तरह श्रेष्ठ वैराग्यके तत्त्वकी बातें बना-बनाकर कहता हूँ ॥५॥ इतनेपर भी मैं लज्जाको ऐसा घोलकर पी गया हूँ कि आपका (दास) कहलाता हूँ। अतः हे रघुनाथजी ! आप इस निर्लज्जतापर रीझकर तुलसीको छोड़ दीजिये—संसार-जालसे मुक्त कर दीजिये ॥६॥ विशेष १—'निलजता……छोरि'—कहनेका यह आशय है कि जिस प्रकार बहुरूपियेकी नकल देखकर राजा प्रसन्न होता और गहरा इनाम देता है, उसी प्रकार हे रामजी, तुलसीदासके ढोंगपर प्रसन्न होकर पुरस्कार-स्वरूप उसके गले- में जो लोभने आशाकी डोरी डाल रखी है उसे छोड़ दीजिये । [१५९] है प्रभु ! मेरोई सब दोसु । सील-सिंधु, कृपालु, नाथ-अनाथ, आरत-पोसु ॥१॥ बेष बचन बिराग मन अघ अवगुननि को कोसु । राम प्रीति-प्रतीति पोली, कपट-करतब ठोसु ॥२॥ राग-रंग कुसंग ही सों, साधु-संगति रोसु । चहत केहरि-जलहिं सेइ सृगाल ज्यों खरगोसु ॥३॥ संभु-सिखवन रसन हूँ नित राम-नामहिं घोसु । दंभहू कलि नाम कुंभज सोच-सागर-सोसु ॥४॥ मोद-मंगल-मूल. अति अनुकूल निज निरजोसु । रामनाम प्रभाव सुनि तुलसिहुँ परम परितोसु ॥५॥ शब्दार्थ—पोसु = पोषक। कोसु = कोश, खजाना। पोली = पोला, खोखला। रोसु = क्रोध। घोषु = घोष, शब्द, रट लगा। निरजोसु = असुख। भावार्थ—हे प्रभो ! सब दोष मेरा ही है। आप शीलके समुद्र, कृपालु, अनाथोंके नाथ और दीन-दुखियोंका पोषण करनेवाले हैं ॥१॥ मेरे वेष और वचनमें तो वैराग्य दिखता है, पर मेरा मन पापों और दुर्गुणोंका खजाना है। हे रामजी ! आपपर मेरा जो प्रेम और विश्वास है, वह तो पोला है, किन्तु