भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 289

२७८ विनय-पत्रिका राग नट १५८ ] कैसे देउँ नाथहिं खोरि । काम-लोलुप भ्रमत मन हरि भगति परिहरि तोरि ॥१॥ बहुत प्रीति पुजाइबे पर, पूजिबे पर थोरि । देत सिख सिखयो न मानत, मूढ़ता असि मोरि ॥२॥ किये सहित सनेह जे अघ हृदय राखे चोरि । संग-बस किये सुभ सुनाये सकल लोक निहोरि ॥३॥ करौं जो कछु धरौं सचि-पचि सुकृत सिला बटोरि । पैठि उर बरवस दयानिधि दंभ लेत अँजोरि ॥४॥ लोभ, मनहिं नचाव कपि ज्यों, गरे आसा-डोरि । बात कहौं बनाइ बुध ज्यों, वर बिराग निचोरि ॥५॥ एतेहुँ पर तुम्हरो कहावत, लाज अँचई घोरि । निलजता पर रीझि रघुबर, देहु तुलसिहिं छोरि ॥६॥ शब्दार्थ—खोरि = दोष । सचि-पचि = बड़े यत्नसे । सिला = खेतमें पड़े हुए दाने । अँजोरि = खोज लेता है । बुध = पण्डित । निचोरि = निचोड़कर, सारांश । अँचई = पी गया । भावार्थ—नाथको कैसे दोष दूँ ! हे हरे ! मेरा मन आपकी भक्ति छोड़कर काम-लोलुप बना फिरता है ॥१॥ अपने पुजानेमें तो मेरी बड़ी प्रीति है, किन्तु आपकी पूजा करनेमें बहुत कम प्रेम है। मेरी ऐसी मूर्खता है कि मैं दूसरोंको तो खूब शिक्षा देता हूँ, पर स्वयं किसीका सदुपदेश नहीं मानता ॥२॥ मैंने जिन पापोंको बड़े स्नेहसे किया है, उन्हें तो हृदयमें चुरा रखा है, किन्तु सत्संगमें पड़कर यदि कोई शुभ कर्म किया है तो उसे सब लोगोंको निहोरा करके सुनाया है ॥३॥ जो कुछ शुभ कर्म करता हूँ उसे खेतमें पड़े हुए दानेकी तरह बटोरकर रखता हूँ; किन्तु हे दयानिधि ! दम्भ मेरे हृदयमें जबर्दस्ती पैठकर उसे भी खोज लेता है। अर्थात् दम्भके कारण उन शुभ कर्मोंको लोगोंसे कह-कहकर पुण्य क्षय कर डालता हूँ ॥४॥ लोभ मेरे मनको बन्दरकी तरह उसके गलेमें