भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 288

विनय-पत्रिका २९७ [ १५७ ] सेइये सुसाहिब राम सो । सुखद सुसील सुजान सूर सुचि, सुन्दर कोटिक काम सो ॥१॥ सारद सेस साधु महिमा कहैं, गुनगन-गायक साम सो । सुमिरि सप्रेम नाम जासों रति चाहत चन्द्र-ललाम सो ॥२॥ गमन विदेस न लेस कलेस को, सकुचत सकृत प्रनाम सो । साखी ताको विदित विभीषन, बैठो है अबिचल धाम सो ॥३॥ टहल सहल जन महल-महल, जागत चारो जुग जाम सो । देखत दोष न खीझत, रीझत सुनि सेवक गुन-ग्राम सो ॥४॥ जाके भजे तिलोक-तिलक भये, त्रिजग जोनि तनु ताम सो । तुलसी ऐसे प्रभुहि भजै जो न ताहि विधाता बाम सो ॥५॥ शब्दार्थ—साम = सामवेद । चन्द्र-ललाम = जिनके चन्द्रमा भूषण हैं, अर्थात् शिवजी । टहल = सेवा । सहल = आसान । त्रिजग = तिर्यक् योनि, पशु-पक्षी । भावार्थ—राम-सरीखे सुन्दर स्वामीकी सेवा करनी चाहिये । वह सुख देने- वाले, सुशील, चतुर, वीर, पवित्र और करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक सुन्दर हैं ॥१॥ सरस्वती, शेष और सन्तजन उनकी महिमा कहते हैं, और उनके गुणों- को गानेवाले सामवेद-सरीखे हैं । बड़े प्रेमके साथ नामका स्मरण करते हुए शिवजी-सरीखे (देवाधिदेव) जिनसे प्रेम करना चाहते हैं ॥२॥ जिन्हें विदेश- गमन (वन-यात्रा) करते समय रंचमात्र भी क्लेश नहीं हुआ । जो एक बार प्रणाम करनेसे ही सकुच जाते हैं और इसका साक्षी विभीषण प्रसिद्ध है जो कि आज भी लंकामें अविचल भावसे बैठा हुआ है ॥३॥ जिनकी टहल बहुत आसान है, जो भक्तोंके घट-घटमें चारों युगमें चारों पहर जागते रहते हैं; जो भक्तोंके दोष देखकर भी नहीं खीझते, किन्तु सेवकोंकी गुणावली सुनकर ही (देखनेको कौन कहे) रीझ जाते हैं ॥४॥ जिसे भजकर तिर्यक् योनिके पशु-पक्षी तथा तामसी शरीरवाले (राक्षस) तीनों लोकोंके तिलक हो गये, तुलसीदास कहते हैं कि ऐसे प्रभुको जो लोग नहीं भजते, विधाता उनके प्रतिकूल हैं, अर्थात् उनका दुर्भाग्य है ॥५॥