भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 287

२७६ विनय-पत्रिका भलो लोक-परलोक तासु जाके बल ललित-ललामको। तुलसी जग जानियत नाम ते सोच न कूच मुकामको ॥३॥ शब्दार्थ—कामतरु = कल्पवृक्ष । दुकाल = अकाल, दुर्भिक्ष । बाम = प्रतिकूल । दाहिनो = अनुकूल, प्रसन्न । ललित = सुन्दर । ललाम = सुन्दर, रम्य । भावार्थ—कलियुगमें रामनाम कल्पवृक्ष है। वह दरिद्रता, दुर्भिक्ष, दुःख और दोषको मिटानेवाला तथा सांसारिक त्रितापरूप घामके लिए घोर मेघरूप है ॥१॥ नाम लेते ही विधाताका प्रतिकूल मन भी अधमोंपर या भाग्यहीनोंपर अनुकूल हो जाता है। बड़े-बड़े मुनि और शिवजी भी उलटे-सीधे (किसी प्रकार भी अपनेसे) नामका (ऐसा ही) माहात्म्य कहते हैं, अर्थात् राम-नामरूपी लड्डू टेढ़ा-सीधा हर तरहका सर्वोत्तम है ॥२॥ जिसे ललित-ललाम (सुन्दर और रम्य) राम-नामका भरोसा है उसके लिए लोक-परलोक दोनों ही अच्छे हैं। हे तुलसी- दास ! नामके प्रभावसे इस संसारसे कूच करने अथवा इसमें रहनेका सोच नहीं होता। भाव यह है कि नामके प्रभावसे मनुष्यको जन्म-मरणकी चिन्ता ही नहीं रह जाती ॥३॥ विशेष १—'घोर घन घामको'—इसका अर्थ प्रखर धूप-सदृश त्रिताप भी हो सकता है। २—'बाम'—शब्दका अर्थ लिखा है 'अधमः' । इति सिद्धान्तकौमुद्या- मुणादिवृत्तिः । इस चरणका अर्थ इस प्रकार भी किया जा सकता है:—'प्रति- कूल विधाताका प्रतिकूल मन अनुकूल हो जाता है।' ३—'कहत मुनीस······नामको'—इसका यह अर्थ भी होता है कि 'मुनीश (वाल्मीकि) ने उलटे नामका और शिवजीने सीधे नामका माहात्म्य कहा है।' ४—'ललित-ललाम'—'ललित'का अर्थ है 'सुन्दर' और 'ललाम' का अर्थ मेदिनी कोषमें लिखा है:—'चिह्नम्, ध्वजः, शृंगम्, प्रधानम्, भूषा, रम्यम्, वालधिः, पुण्ड्रम्, तुरंगः, प्रभावः।' यहाँपर 'प्रधान' या 'रम्य' अर्थ ही अभिप्रेत है। वियोगी हरिजीने 'ललित-ललाम' का अर्थ किया है, "यह दोनों ही शब्द सुन्दरके बोधक हैं; सुन्दरसे भी सुन्दर।"