विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरम-जाल कलिकाल कठिन आधीन सुसाधित दाम को । ग्यान बिराग जोग जप तप भय लोभ मोह कोह काम को ॥३॥ सब दिन सब लायक भव गायक रघुनायक गुन-ग्राम को । बैठे नाम-कामतरु-तर डर कौन घोर घन घाम को ॥४॥ को जानै को जैहै जमपुर को सुरपुर पर-धाम को । तुलसिहिं बहुत भलो लागत जग जीवन राम-गुलाम को ॥५॥ शब्दार्थ—बाम = टेढ़े । पर्यो न छठी = भाग्यमें नहीं लिखा । छ रुत = छ शास्त्र । सहमत = सहम जाता है, सिकुड़ जाता है । छाम = दुर्बल । परधाम = बैकुण्ठ, ब्रह्मलोक । भावार्थ—मुझे एक राम-नामका ही विश्वास है। मेरे कुटिल मनका ऐसा ही स्वभाव है; वह (राम नामको छोड़कर) अन्यत्र विश्वास ही नहीं करता ॥१॥ छ शास्त्रों (न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त) का तथा ऋक्, यजु, साम और अथर्वण वेदोंका पढ़ना मेरे भाग्यमें नहीं लिखा है। व्रत, तीर्थ और तप आदिका नाम सुनकर मन सिकुड़ जाता है कि (इनमें) कौन पच-पचकर मरे और शरीरको क्षीण करे ॥२॥ कलिकालमें कर्म-जाल बड़ा ही कठिन है और उसे ठीक-ठीक साध लेना पैसेके अधीन है। रहे ज्ञान, वैराग्य, योग, जप और तप आदि, सो इनके करनेमें काम, क्रोध, लोभ, मोह आदिका भय है ॥३॥ संसारमें श्रीरघुनाथजीके गुणोंको गानेवाले सदा सब प्रकारसे योग्य हैं। क्योंकि राम-नाम-रूपी कल्पवृक्षके नीचे बैठे हुए लोगोंको कड़ी धूप (सांसारिक त्रितापों) का क्या डर है ? ॥४॥ कौन जानता है कि कौन यमपुरी (नरक) में जायगा, कौन स्वर्गमें जायगा और कौन ब्रह्मलोकमें जायगा ? तुलसीदासको तो इस संसारमें श्रीरामजीके गुलामका जीवन ही बहुत अच्छा लगता है ॥५॥ [ १५६ ] कलि नाम कामतरु राम को । दलनिहार दारिद दुकाल दुख, दोष घोर घन घाम को ॥१॥ नाम लेत दाहिनो होत मन, बाम विधाता वामको । कहत मुनीस महेस महातम, उलटे सीधे नाम को ॥२॥