भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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२७४ विनय-पत्रिका आप तुलसीदासको अपना दास बना लीजिये—मैं बिना मोल (आपके हाथ) बिकना चाहता हूँ ! तात्पर्य यह है कि मैं निष्काम सेवक बनना चाहता हूँ॥३॥ [ १५४ ] देव ! दूसरो कौन दीन को दयालु । सील-निधान सुजान-सिरोमनि, सरनागत-प्रिय प्रनत-पालु ॥१॥ को समरथ सर्वग्य सकल प्रभु, सिव-सनेह-मानस-मरालु । को साहिब किये मीत प्रीति बस खग निसिचर कपि भील भालु॥२ नाथ हाथ माया-प्रपंच सब, जीव-दोष-गुन-करम-कालु । तुलसिदास भलो पोच रावरो, नेकु निरखि कीजिय निहालु॥३॥ भावार्थ—हे देव ! (आपके सिवा) दीनोंपर दया करनेवाला दूसरा कौन है ? आप शील-निधान, ज्ञानियोंमें शिरोमणि, शरणागतोंके परम प्रिय और भक्तों- के पालनेवाले हैं ॥१॥ आपके समान सामर्थ्यवान, सर्वज्ञ और सबका स्वामी कौन है ? आप शिवजीके स्नेहरूपी मानसरोवरमें (विहार करनेवाले) हंस हैं । (आपके सिवा) किस स्वामीने प्रेमवश पक्षी (जटायु), निशाचर (विभीषण), बन्दर (सुग्रीव), भील (निषाद) और भालुओं (जामवन्त आदि) को अपना मित्र बनाया है ? ॥२॥ हे नाथ ! मायाके प्रपंच, जीवोंके दोष, गुण कर्म और काल सब आपके हाथ हैं । यह तुलसीदास भला हो या बुरा, आपका ही है । जरा इसकी ओर देखकर इसे निहाल कर दीजिये ॥३॥ विशेष १—‘खग’—जटायु; २१५वें पदके विशेषमें देखिये । राग सारङ्ग [ १५५ ] बिस्वास एक राम-नाम को । मानत नहिं परतीति अनत ऐसोइ सुभाव मन वाम को ॥१॥ पढ़िबो परचो न छठी छ मत रिगु जजुर अथर्बन सामको । व्रत तीरथ तप सुनि सहमत पचि मरै करै तन छाम को ? ॥२॥