भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 284

विनय-पत्रिका २७३ निवासी मूर्ख धोबी (जगज्जननी जानकीकी निन्दा करनेवाला), जिसमें खाक- पत्थर भी समझ न थी, अथवा जो खाककी तरह तुच्छ समझा जाता था, वह नीच भी उस स्थानपर पहुँच गया था जहाँ पहुँचनेमें मुनियोंका मन भी थक जाता है ॥१०॥ ब्रह्माने ऐसा किसे बनाया है, जो रामनामके प्रभावसे मुक्ति न पा सके। (रामनामका) स्मरण पार्वती-वल्लभ भगवान् शंकर करते हैं और दूसरोंसे कह-कहकर उसका प्रचार करते हैं ॥११॥ अजामिलकी कथा सुनकर कौन आनन्दित नहीं हुआ ? नाम लेते ही इस कलिकालमें भी ऐसा कौन है जो विष्णुलोकमें नहीं गया ? ॥१२॥ रामनामकी ऐसी महिमा है कि वह आकके पेड़को कल्पवृक्ष बना सकती है। इसके लिए वेद और पुराण साक्षी हैं; और फिर तुलसीके शरीरको देखो न ! (वह क्यासे क्या हो गया) ॥१३॥

[ १५३ ] मेरे रावरियै गति है रघुपति बलि जाउँ । निलज नीच निरधन निरगुन कहँ, जग दूसरो न ठाकुर ठाउँ ॥१॥ हैं घर घर बहु भरे सुसाहिब, सूझत सबनि आपनो दाउँ । बानर-बंधु विभीषन-हितु बिनु, कोसलपाल कहूँ न समाउँ ॥२॥ प्रनतारति-भंजन जन-रंजन, सरनागत पवि-पंजर नाउँ । कीजै दास दासतुलसी अब, कृपासिंधु बिनु मोल बिकाउँ ॥३॥

शब्दार्थ—रावरियै = आपकीही । ठाउँ = जगह । प्रनतारति (प्रणत + आरति) = भक्तोंका दुःख । पवि = वज्र ।

भावार्थ—हे रघुनाथजी ! बलिहारी, मुझे तो केवल आपकीही शरण है । मुझ निर्लज्ज, नीच, निर्धन और गुणहीनके लिए संसारमें न तो दूसरा कोई स्वामी है और न कोई स्थान ही है ॥१॥ यों तो घर-घरमें बहुत-से अच्छे-अच्छे स्वामी भरे पड़े हैं, किन्तु उन सबको अपना दाँव सूझता है । मैं तो बन्दरोंके बन्धु और विभीषणके हितू कोशलपाल रामजीको छोड़कर कहीं भी (किसी भी घरमें) नहीं समा सकता ॥२॥ आपका नाम भक्तोंके दुःखोंका नाशक, भक्तोंको सुख देने- वाला तथा शरणागतोंके लिए वज्रका बना हुआ पिंजरा है । हे कृपासिन्धु ! अब १८