विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ विनय-पत्रिका राम-नाम-महिमा करै काम-भूरुह-आको। साखी वेद-पुरान हैं तुलसी-तन ताको ॥१३॥ शब्दार्थ—साको = यश। भो = हुए। कौसिक = विश्वामित्र। गरत = गलते थे। अन हित = यह शब्द ताड़काके लिए आया है। उपसम = शान्ति। गतग्याति = नीच जाति बालिस = मूढ़। खाको = खाक। थाको = थक जाता है। सिरजा = सृजा, बनाया। अकनि = अकनकर, सुनकर। भा = हुआ। गा = गया। भूरुह = वृक्ष। आको = आक, मन्दार। भावार्थ—रामजीने अपनी भलमनसाहतसे किसका भला नहीं किया ? संसारमें युग-युगसे जानकीनाथका यश जाग रहा है अर्थात् प्रसिद्ध है ॥१॥ ब्रह्मा आदिने पृथिवीका दुःख कहकर विनती की, और सूर्यवंशरूपी कुमुदिनीको प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्ररूप एवं अमृततुल्य आनन्दसे पूर्ण भगवान् रामजीने अवतार लिया ॥२॥ विश्वामित्र, ताड़काका तेज देखकर ओलेकी तरह गले जाते थे। प्रभुने अनहित (ताड़का) को हितका, और कोपका कृपा (के रूपमें) फल दिया। अर्थात्, ताड़काको मारा तो कुपित होकर शत्रुको तरह, पर उसे मुक्त कर दिया मित्रकी तरह ॥३॥ आपने अपनेसे जाकर शिला अहल्याका पाप-सन्ताप हर लिया और मिथिलाधिपति जनकजीको शोक-सागरमें डूबनेसे उबार लिया। अर्थात् धनुष तोड़कर उनकी चिन्ता दूर कर दी ॥४॥ परशुरामजी क्रोधके समूह और अहंता-ममताके धनी थे; उन्हें भी आपने अपनी दृष्टि डालते ही शान्ति और समताका पात्र बना लिया। अर्थात् वह क्रोध-रहित होकर शान्त हो गये और अहंकार एवं ममत्वको छोड़कर समद्रष्टा हो गये ॥५॥ आप माता- पिताकी आज्ञा मानकर प्रसन्नताके साथ वन चले गये। ऐसा धर्म-धुरन्धर, धीरज धारण करनेवाला तथा गुण-शीलको जीतनेवाला दूसरा कौन है ? ॥६॥ नीच जातिके गरीब गुहनिषादने भी, जो सब प्रकारके जीवोंको भक्षण करनेवाला था—पवित्र प्रेम और सखाके समान सम्मान पाया था ॥७॥ भला शबरी और गीध (जटायु) को आदरके साथ सद्गति कौन देता ? अत्यन्त शोकातुर सुग्रीवका संकट कौन हरण करता ? ॥८॥ कालका ग्रसा हुआ ऐसा कौन था जो विभीषण- को (अपनी शरणमें) रख सकता ? अर्थात्, किसके सिरपर काल सवार था जो रावणसे बैर मोल लेकर विभीषणको शरण देता ? किन्तु (रामजीकी कृपासे) आज भी वह राज्य (लंका) विराजमान है—जहाँका राजा रावण था ॥९॥ अयोध्या-