विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २७१ नामसे प्रेम करता, तो यह तुलसी श्रीरामजीके प्रसादसे तीनों तापोंसे तप्त न होता—जलता न ॥९॥ [ १५२ ] राम भलाई अपनी भल कियो न काको। जुगुजुग जानकिनाथ को जग जागत साको ॥१॥ ब्रह्मादिक बिनती करी कहि दुख बसुधाको। रवि-कुल-कैरव - चंद भो आनंद - सुधाको ॥२॥ कौसिक गरत तुषार ज्यों तकि तेज तियाको। प्रभु अनहित हित को दियो फल कोप कृपाको ॥३॥ हन्यो पाप आप जाइकै संताप सिलाको। सोच-मगन काढ्यो सही साहिब मिथिलाको ॥४॥ रोष-रासि भृगुपति धनी अहमिति ममता को। चितवत भाजन करि लियो उपसम समता को ॥५॥ मुदित मानि आयसु चले बन मातु-पिताको। धरम-धुरंधर धीर धुर गुन-सील-जिता को ? ॥६॥ गुह गरीब गतग्याति हू जेहि जिउ न भखाको ? । पायो पावन प्रेम तें सनमान सखा को ॥७॥ सदगति सबरी गीध की सादर करता को ? । सोच-सींव सुग्रीव के संकट हरता को ? ॥८॥ राखि बिभीषन को सकै अस काल-गहा को ? । आज बिराजत राज है दसकंठ जहाँ को ॥९॥ बालिस बासी अवध को बूझिये न खाको। सो पाँवर पहुँचे तहाँ जहँ मुनि-मन थाको ॥१०॥ गति न लहै राम-नाम सों विधि सों सिरजा को ? । सुमिरत कहत प्रचारि कै बल्लभ गिरिजा को ॥११॥ अकनि अजामिल की कथा सानंद न भा को ? । नाम लेत कलिकाल हू हरि पुरहिं न गा को ? ॥१२॥