भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 281

२७० विनय-पत्रिका भव-मग अगम अनंत है, बिनु श्रमहिं सिरातो । महिमा उलटे नाम की मुनि कियो किरातो ॥७॥ अमर-अगम तनु पाइ सो जड़ जाय न जातो । होतो मंगल-मूल तू, अनुकूल बिधातो ॥८॥ जो मन, प्रीति-प्रतीति सों राम-नामहिं रातो । तुलसी राम प्रसाद सों तिहुँ ताप न तातो ॥९॥ शब्दार्थ—चेराई = सेवा। सूम = कंजूस, कपड़ेका स्वरूप बनाकर बाजीगर जो तमाशा दिखाते हैं, उसे सूम कहते हैं। खेह = धूल। कारनी = कारण, प्रेरक। कोहातो = क्रोध करते, नाराज होते। रतिआतो = प्रीति करता, लगन लगाता। पतिआतो = विश्वास करते। पिरातो = दर्द होता। काँदलो = मलिनता। हृद = सरोवर। जाय = व्यर्थ। भावार्थ—(रे जीव !) यदि तू श्रीरामजीकी सेवा करनेमें न लज्जित होता, तो तू दाम (शुद्ध सुवर्ण) होकर कुदाम (ताँबा-पीतल) की तरह इस हाथसे उस हाथ न बिकता। अर्थात् तू परमात्माका अंश होकर अनेक योनियोंमें भटकता न फिरता ॥१॥ यदि तू जीभसे रघुनाथजीका नाम जपनेमें आलस्य न करता, तो रे खल ! तू बाजीगरके सूमकी तरह धूल न फाँकता ॥२॥ रे मन ! यदि तू राम-नामकी कमाई करता, तो सीतानाथके सम्मुख या प्रसन्न हो जानेसे तू सुखी हो जाता और सब जगह (लोक-परलोकमें) प्रवेश करता, अर्थात् लोक-परलोक दोनों ही बन जाते ॥३॥ यदि रामजी तुझे अच्छे लगते तो तू भी सबको भाता। फिर तो काल, कर्म आदि जितने कारणी हैं, कोई भी तुझपर क्रोध न करते ॥४॥ यदि तू हृदयसे राम-नामके अनुरागमें लगन लगाता, तो स्वार्थ और परमार्थ दोनोंके पथिक तुझपर विश्वास करते ॥५॥ यदि तू साधुकी सेवा करता, दूसरोंकी पीड़ा सुन और समझकर तुझे दर्द होता, तो करोड़ों जन्मकी मलिनता तेरे हृदय-सरोवरमें नीचे बैठ जाती ॥६॥ (उस दशामें) संसारका जो मार्ग अगम और अनन्त है, उसे तू बिना परिश्रमके ही पार कर जाता। (देख न) उलटे नामकी महिमाने किरात (बाल्मीकि) को मुनि बना दिया था ॥७॥ रे जड़ ! (फिर तो) तेरा देवताओंके लिए दुर्लभ शरीर पाना व्यर्थ न जाता, तू मंगल-मूल हो जाता, विधाता तेरे अनुकूल हो जाते ॥८॥ रे मन ! यदि तू प्रेम और विश्वाससे राम-