भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 280

विनय-पत्रिका २६१ की ओर देखिये, उसीमें कोई मैं भी होऊँगा। अर्थात् जिन अधमोंको आप तार चुके हैं, उनमें किसी-न-किसी अधमीकीसी ही अधमता मेरी भी होगी। हे प्रभो ! आपका त्यागा हुआ यह तुलसी आपकी शरणमें जाकर सामने ही रहेगा— अन्यत्र कहीं न जायगा ॥६॥ विशेष यह पद अत्यन्त भावपूर्ण और सच्चे हृदयोद्गारका सुन्दर द्योतक है। इसमें गुसाईंजीकी आन्तरिक भावना झलक रही है। १—'बड़ी·········नाईं'—इसका यह भी अर्थ हो सकता है कि 'मेरे हृदयमें ग्लानि है कि (मेरे कारण) सर्वज्ञ स्वामीकी हानि हो रही है। क्योंकि कुत्तेकी तरह सेवकका भी काम बिगड़नेपर स्वामीके ही सिर गालियाँ पड़ती हैं। किन्तु असली अर्थ वही है, जो भावार्थमें लिखा गया है। इसमें 'सर्वज्ञ' शब्द बड़ा ही सार्थक है। 'बड़ी ग्लानि है, हृदयमें हानि मानता हूँ' हे नाथ इसे आप समझ रहे हैं कि मैं सच कह रहा हूँ या नहीं। क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं। [ १५१ ] जौ पै चेराई राम की करतो न लजातो। तौ तू दाम कुदाम ज्यों कर-कर न बिकातो ॥१॥ जपत जीह रघुनाथ को नाम नहीं अलसातो। बाजीगर के सूम ज्यों खल खेह न खातो ॥२॥ जौ तू मन ! मेरे कहे राम-नाम कमातो। सीतापति सनमुख सुखी सब ठाँव समातो ॥३॥ राम सोहाते तोहिं जौ तू सबहिं सोहातो। काल करम कुल कारनी कोऊ न कोहातो ॥४॥ राम-नाम अनुराग ही जिय जो रतिआतो। स्वारथ-परमारथ-पथी तोहिं सब पतिआतो ॥५॥ सेइ साधु सुनि समुझि कै पर-पीर पिरातो। जनम कोटि को काँदलो हृद-हृदय थिरातो ॥६॥