विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ विनय-पत्रिका [ १५० ] रामभद्र ! मोहिं आपनो सोच है अरु नाहीं। जीव सकल संतापके भाजन जग माहीं ॥१॥ नातो बड़े समर्थ सों इक ओर किधौं हूँ। तो को मोसे अति घने मोको एकै तूँ ॥२॥ बड़ी गलानि हिय हानि है सर्बग्य गुसाँई । क्रूर कुसेवक कहत हौं सेवककी नाईं ॥३॥ भलो पोच राम को कहैं मोहिं सब नरनारी। बिगरे सेवक खान ज्यों साहिब-सिर गारी ॥४॥ असमंजस मनको मिटै सो उपाय न सूझै। दीनबन्धु ! कीजै सोई बनि परै जो बूझै ॥५॥ विरुदावली बिलोकिये तिन्हमें कोउ हौं हौं। तुलसी प्रभुको परिहन्यो सरनागत सो हौं ॥६॥ शब्दार्थ—रामभद्र = कल्याण । भाजन = पात्र । क्रूर = दुष्ट । पोच = बुरा, नीच । भावार्थ—हे कल्याण-स्वरूप रामजी ! मुझे अपना सोच है भी और नहीं भी है। क्योंकि संसारमें सब जीव दुःख-भाजन हैं; अर्थात् सोच तो इसलिए है कि हाय ! मेरा अभीतक उद्धार नहीं हुआ और निश्चिन्त इसलिए हूँ कि जीव- मात्रकी तो यही दशा है, फिर सोच किस बातका ? ॥१॥ क्या बड़े समर्थसे केवल एक ही (मेरी ही) ओरसे नाता है ? इसलिए कि आपके लिए मुझ-से बहुत हैं और मेरे लिए आप केवल एक ही हैं ? ॥२॥ किन्तु हे स्वामी ! आप तो सर्वज्ञ हैं—घट-घटकी जानते हैं, मुझे (इस बातकी) बड़ी ग्लानि है और उसे मैं अपने हृदयमें हानि भी समझता हूँ कि दुष्ट और बुरा सेवक होनेपर भी मैं सेवककी तरह आपसे कह रहा हूँ ॥३॥ मैं भला हूँ या बुरा, पर सब स्त्री-पुरुष मुझे रामजीका ही कहते हैं। कुत्तेकी तरह सेवकका भी काम बिगड़नेसे स्वामीके ही सिर गालियाँ पड़ती हैं (बस यही ग्लानि है) ॥४॥ मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं सूझ रहा है जिससे मेरे मनका असमंजस मिट जाय। अतः हे दीनबन्धु ! जो जान पड़े और हो सके, वही (मेरे लिए) कीजिये ॥५॥ आप अपनी बिरदावली-