विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिन्तु हे कृपानिधि ! यदि आप भी मेरे जैसा ही करेंगे तो कैसे काम चलेगा ? ॥२॥ हे रघुवंश-विभूषण ! जबतक आप न देखेंगे (कृपा न करेंगे), तबतक नित्य-प्रति बुरे दिन रहेंगे, नित्य-प्रति दुर्दशा होती रहेगी , रोज-रोज दुःख होता रहेगा और नित्य दोष लगते रहेंगे ॥३॥ मैंने जो पीठ दी है (आपसे मुँह मोड़ा है), वह इसलिए कि मैं दृष्टिहीन (अन्धा) हूँ; किन्तु आप विश्व-विलोचन अर्थात् संसारके द्रष्टा हैं। हे भक्तोंके सोचको हरनेवाले, आपके समान आप ही हैं, दूसरा कोई नहीं ॥४॥ हे देव ! हे स्वामी ! मैं पराधीन हूँ, दीन हूँ और आप स्वाधीन हैं। मैं आपकी बलि जाऊँ। (आप ही कहिये कि) क्या छाया (कभी) बोलनेवालेसे विनय करती है (कर सकती है) ? ॥५॥ इसलिए पहिले आप अपनी ओर देखकर पीछे मेरी ओर देखिये, बादमें इस दासको सच्चा मानिये। जो राम-नामकी बड़ी आड़में हो गया अर्थात् जिसने राम-नामका प्रधान सहारा ले लिया, वह बच गया ॥६॥ हे रामजी ! आपकी रहन और रीति मेरे हृदयमें नित्य-प्रति उमड़ती रहती है; अतः जैसे रुचे वैसे कृपा कीजिये—यह तुलसी आपका है ॥७॥
विशेष
१—"बोलनिहारे......झाईं"—इसमें बड़ा ही गूढ़ अभिप्राय है। अर्थात् जैसे जड़ परछाईं कुछ नहीं कर सकती, वैसे ही परमात्माका प्रतिबिम्ब यह जीव भी स्वयं कुछ नहीं कर सकता। क्योंकि प्रतिबिम्ब तो बिम्बके आधारपर आचरण करता है। जैसा आचरण बिम्ब करता है, वैसा ही प्रतिबिम्बमें प्रतीत होता है। जैसे, जब हम खड़े होते हैं, तब हमारी छाया भी खड़ी हो जाती है; जब हम बैठते हैं तब परछाईं भी बैठ जाती है। हम जो भी चेष्टा करते हैं, सब छायामें प्रतीत होती है। ठीक वही दशा जीवकी है। इसी भावको लेकर गोस्वामीजीने कहा है कि आप जो कुछ करते हैं, वही इस जीवमें प्रतीत होता है। ऐसी दशामें यदि आप ईश्वर होकर इससे सेवा चाहें या इसकी करनी देखें, तो क्या उचित होगा ? क्योंकि यह तो आपके आश्रित है। इसीसे आगे एक चरणमें गोस्वामीजी कहते हैं कि हे नाथ ! पहले आप अपनी ओर देखकर पीछे मेरी ओर देखिये। धन्य गोस्वामीजी !