भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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२६६ विनय-पत्रिका गरीबोंपर कृपा करनेवाले हैं, पर मैंने गरीबी अख्तियार नहीं की। हे प्रभो ! इस तुलसीके लिए आप अपनी ओरसे जो कुछ बन पड़े सो कीजिये ॥५॥ विशेष १—'भरि पेट बिगारी'—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि मैंने पेट भरनेमें ही सब बिगाड़ दिया अर्थात्, जन्मभर मुझे पेटके ही लाले पड़े रहे, कुछ भी करते-धरते न बना। [ १४९ ] कहाँ जाउँ, कासों कहौं, और ठौर न मेरे। जनम गँवायो तेरे ही द्वार किंकर तेरे ॥१॥ मैं तो बिगारी नाथ सों आरति के लीन्हें। तोहि कृपानिधि क्यों बनै मेरी-सी कीन्हें ॥२॥ दिन-दुरदिन दिन-दुरदसा, दिन-दुख दिन दूषन । जब लौं तू न बिलोकि है रघुबंस-विभूषन ॥३॥ दई पीठ बिनु डीठ मैं तुम बिस्व-विलोचन । तो सों तुही न दूसरो नत सोच-विमोचन ॥४॥ पराधीन देव दीन हौं, स्वाधीन गुसाईं। बोलनिहारे सों करै बलि बिनय कि झाँईं ॥५॥ आपु देखि मोहिं देखिये जन मानिय साँचो । बड़ी ओट रामनामकी जेहि लई सो बाँचो ॥६॥ रहनि रीति राम रावरी नित हिय हुलसी है। ज्यों भावै त्यों करु कृपा तेरो तुलसी है ॥७॥ शब्दार्थ—किंकर = दास । आरतिके लीन्हें = क्लेश-ग्रस्त होनेके कारण । डीठ = दृष्टि । नत = झुकनेपर, प्रणत । झाँईं = छाया । भावार्थ—कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ ? मेरे लिए तो और कहीं ठौर नहीं ! मैं तो आपका ही दास हूँ और आपहीके द्वारपर मैंने सारी जिन्दगी बितायी है ॥१॥ हे नाथ ! आपकी ओरसे मैंने तो बिगाड़ा है क्लेश-ग्रस्त होनेके कारण;

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