विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहैं इन्द्रियाँ, और उन कर्मोंका फल भोगना पड़ता है मुझे ॥४॥ ये बड़े विचित्र दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि इन्हें छोड़ते नहीं बनता। हे प्रभो ! मैं असमंजसमें मग्न हो रहा हूँ, मेरी बाँह पकड़ लीजिये ॥५॥ आपकी बलैया लेता हूँ, एक बार इस दासके हृदयका कौतुक तो देख लीजिये। इतनेहीसे तुलसीदास- का संकट अनायास मिट जायगा ॥६॥
[१४८] कहौं कवन मुँह लाइ कै रघुबीर गुसाईं। सकुचत समुझत अपनी सब साईँ दुहाई ॥१॥ सेवत बस, सुमिरत सखा, सरनागत सो हौं । गुनगन सीतानाथके चित करत न हौं हौं ॥२॥ कृपासिंधु बंधु दीनके आरत-हितकारी। प्रनत-पाल बिरुदावली सुनि जानि विसारी ॥३॥ सेइ न धेइ न सुमिरि कै पद-प्रीति सुधारी। पाइ सुसाहिब रामसों, भरि पेट विगारी ॥४॥ नाथ गरीब-निवाज हैं, मैं गही न गरीबी। तुलसी प्रभु निज ओर तें बनि परै सो कीबी ॥५॥
शब्दार्थ- दुहाई = सौगन्ध । हौं = मैं। हौं = हूँ। धेइ = ध्येय । भरिपेट = पेटभर, अधिकसे अधिक । कीबी = कीजियेगा, कीजिये ।
भावार्थ- हे रघुवीर ! हे स्वामी ! मैं कौनसा मुँह लेकर आपसे कुछ कहूँ ? दुहाई स्वामीकी ! मैं अपनी करनी समझते ही सकुच जाता हूँ ॥१॥ आप सेवा करनेसे वशमें हो जाते हैं, स्मरण करनेसे मित्र बन जाते हैं और शरणागत होनेसे सम्मुख प्रकट हो जाते हैं। हे सीतानाथ ! आपके इन गुणोंपर ध्यान नहीं दे रहा हूँ ॥२॥ हे कृपासागर ! आप दीनोंके बन्धु हैं, दुखियोंका हित करनेवाले हैं और शरणागतोंका पालन करनेवाले हैं, आपकी इस विरुदावलीको सुन और जानकर भी मैंने आपको भुला दिया है ॥३॥ सेवा द्वारा, ध्यान द्वारा अथवा स्मरण द्वारा मैंने आपके चरणोंमें प्रेम नहीं किया। हे रामजी ! आपके समान अच्छा स्वामी पाकर भी मैंने खूब बिगाड़ डाला ॥४॥ हे नाथ ! आप तो