भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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२६४ विनय-पत्रिका [ १४७ ] कृपासिंधु ताते रहौं निसिदिन मन मारे। महाराज ! लाज आपु ही निज जाँघ उघारे ॥१॥ मिले रहैं मान्यौ चहैं कामादि सँघाती। मो बिनु रहैं न, मेरिये जारैं छल छाती ॥२॥ बसत हिये हित जानि मैं सबकी रुचि पाली। कियो कथक को दंड हौं जड़ करम कुचाली ॥३॥ देखी सुनी न आजु लौं अपनायति ऐसी। करहिं सबै सिर मेरे ही फिरि परै अनैसी ॥४॥ बड़े अलेखी लखि परैं, परिहरे न जाहीं। असमंजस में मगन हौं, लीजै गहि बाहीं ॥५॥ बारक बलि अवलोकिये, कौतुक जन जी को। अनायास मिटि जाइगो संकट तुलसी को ॥६॥ शब्दार्थ—मन मारे = उदास। सँघाती = साथी। अनैसी = अनिष्ट, निषेध। अलेखी = विचित्र, दिखाई न पड़नेवाले। भावार्थ—हे कृपासिन्धु ! हे महाराज ! इसीसे मैं रात-दिन मन मारे रहता हूँ कि जंघा उघारना अपने ही लिए लज्जाकी बात है ॥१॥ ये काम-क्रोधादि साथी मिले भी रहते हैं और मारना भी चाहते हैं। ये मेरे बिना रहते भी नहीं और छलसे मेरी ही छाती जलाते हैं। तात्पर्य, जबतक मुझमें जीवन है, तभीतक इनका अस्तित्व है; इस प्रकार आश्रित रहते हुए भी ये मेरा ही सर्वनाश करते हैं ॥२॥ यह जानकर कि ये मेरे हृदयमें बसते हैं, मैंने सबकी रुचिका भी पालन किया, अर्थात् सब विषयोंको भोग लिया, फिर भी इन जड़ और कुचाली कर्मोंने मुझे कथककी लकड़ी बना रखा है। अर्थात्, जिस प्रकार कथक अपने लड़केको नाच सिखानेके लिए लाठीमें घुँघरू बाँधकर नचाता है, उसी तरह ये मुझे नचा रहे हैं। यहाँ लकड़ीकी चंचलतासे तात्पर्य है ॥३॥ आज- तक मैंने ऐसी पराधीनता देखी या सुनी नहीं कि कर्म तो करते हैं वे सब स्वयं, और लौटकर उस कर्मका अनिष्ट पड़ता है मेरे मत्थे। अर्थात् कर्म तो करती

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