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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 274

विनय-पत्रिका २६३ है। जब मैंने उनसे कहा कि (मैं तो श्रीरामजीके हाथ बिकना चाहता हूँ, तब उन ग्राहकोंने) कपट-प्रेम दिखाकर मेरे हृदयमें डेरा डालनेके लिए स्थान माँगा ॥३॥ इस संसारमें कलियुगके जेरवार करनेसे अब तक तो मैं आपके नामकी ओटमें बचता आया, पर अब इस गरीब सेवककी आप रक्षा कीजिये; नहीं तो इसे ढूँढ़नेसे पाना कठिन हो जायगा, अर्थात् कलियुग इस दासका नाम-निशान मिटा देगा ॥४॥ हे प्रभो ! आपने जिस कौतुकसे पक्षी (उल्लू) और कुत्तेका फैसला किया था, उसी कौतुकसे हे कृपालु ! कह दीजिये कि तुलसी मेरा है ॥५॥ विशेष १—'खग'—कुछ प्रतियोंमें 'बक' पाठ मिलता है। पर अधिकांशमें 'खग' पाया जाता है। बक नाम है बगुलेका। बाल्मीकीय रामायणमें उल्लूका प्रसंग आया है। उसकी कथा इस प्रकार है—उल्लू और गीध जंगलमें एक ही घरमें रहते थे। एक दिन गीधने घरपर अधिकार करनेके इरादेसे उल्लूसे कहा,— हमारा घर खाली कर दो, इसपर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं। अन्तमें दोनों रामजीके दरबारमें अपने झगड़ेका फैसला कराने गये। रामजीने उल्लूसे पूछा,— 'घर किसका है ? तू उसमें कबसे रहता है ?' उल्लूने कहा,—'जबसे वृक्षोंकी सृष्टि हुई तभीसे मैं उस घरमें रहता हूँ।' गीधने कहा,—'और जबसे मानव- सृष्टि हुई, तबसे मैं रहता हूँ।' भगवान्ने गीधसे कहा,—'वृक्षोंकी सृष्टि मनुष्योंसे पहले हुई है, इसलिए वह घर उल्लूका है, तुम घर खाली कर दो।' २—'स्वान'—एक दिन रामजीकी सभामें एक कुत्ता आया, और रोकर कहने लगा,—'महाराज ! तीर्थसिद्ध नामक ब्राह्मणने मुझ निरपराधको लाठीसे मारा है।' भगवान्ने उक्त ब्राह्मणको बुलाया और उससे लाठी मारनेका कारण पूछा। ब्राह्मणने कहा,—मैं भीख माँग रहा था, इसे रास्तेसे हटाया; जब यह न हटा, तब मैंने लाठी मार दी।' भगवान्ने ब्राह्मणको अदण्डनीय समझकर कुत्तेसे ही पूछा कि इसे क्या दण्ड दिया जाय ? अन्तमें प्रभुजीने कुत्तेकी रायसे ही उस ब्राह्मणको कालिंजरका मठाधीश बनाकर दोनोंका झगड़ा तय किया। १. पाठान्तर 'बक'।