भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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२६२ विनय-पत्रिका ५—"मैं तुम्हरो······राम गुसाईं"—यहाँ ग्रन्थकारने भगवान्‌पर बड़े ही सुन्दर ढंगसे आरोप किया है। तात्पर्य यह है कि मेरे लिए विवेक, वैराग्य आदि सद्गुणोंको हृदयमें स्थित करना ही बुरा हुआ। यदि मेरा झुकाव इस ओर न हुआ होता, तो कुटिल काम-क्रोधादि क्रुद्ध होकर न तो मुझपर जोर- जुर्म ही करते और न वे स्त्री, शत्रु तथा धन-सम्पत्तिका इतना प्रबल लोभ ही मेरे हृदयमें उत्पन्न करते। यदि आपके कारण किसी दासको काम-क्रोधादिका कोप-भाजन बनकर दुःख भोगना पड़े, तो इसमें दोष किसका है ? [ १४६ ] हौं सब विधि राम, रावरो चाहत भयो चेरो। ठौर ठौर साहबी होत है, ख्याल काल कलि केरो ॥१॥ काल-करम-इंद्रिय-विषय गाहक गन घेरो। हौं न कबूलत, बाँधि कै मोल करत करेरो ॥२॥ बन्दि-छोर तेरो नाम है, बिरुदैत बड़ेरो। मैं कह्यो, तब छल-प्रीति कै माँगे उर डेरो ॥३॥ नाम-ओट अब लगि बच्यो मलजुग जग जेरो। अब गरीब जन पोषिये पाइबो न हेरो ॥४॥ जेहि कौतुक खग स्वान को प्रभु न्याव निबेरो। तेहि कौतुक कहिये कृपालु ! 'तुलसी है मेरो' ॥५॥ शब्दार्थ—करेरो = कड़ा। विरुदैत = बानावाले। मलजुग = कलियुग। जेरो = जेरबार करना, हैरान करना। निबेरो = फैसला किया। भावार्थ—हे रामजी! मैं सब प्रकारसे आपका सेवक होना चाहता हूँ। किन्तु यहाँ कलि-कालका ऐसा ख्याल है कि जगह-जगह साहबी हो रही है ॥१॥ (वह साहबी कौन कर रहा है, सो आगे कहते हैं) काल, कर्म और इन्द्रियोंके विषयरूपी ग्राहकोंने मुझे घेर लिया है। मैं कबूल नहीं करता, पर वे बाँधकर अथवा जबर्दस्ती (मुझे खरीद लेनेके लिए) कड़ा मोल करते हैं ॥२॥ आपका नाम बन्दीछोर (बन्धनसे मुक्त कर देनेवाला) है और आपका बाना भी बड़ा

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