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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

२६२ विनय-पत्रिका ५—"मैं तुम्हरो······राम गुसाईं"—यहाँ ग्रन्थकारने भगवान्‌पर बड़े ही सुन्दर ढंगसे आरोप किया है। तात्पर्य यह है कि मेरे लिए विवेक, वैराग्य आदि सद्गुणोंको हृदयमें स्थित करना ही बुरा हुआ। यदि मेरा झुकाव इस ओर न हुआ होता, तो कुटिल काम-क्रोधादि क्रुद्ध होकर न तो मुझपर जोर- जुर्म ही करते और न वे स्त्री, शत्रु तथा धन-सम्पत्तिका इतना प्रबल लोभ ही मेरे हृदयमें उत्पन्न करते। यदि आपके कारण किसी दासको काम-क्रोधादिका कोप-भाजन बनकर दुःख भोगना पड़े, तो इसमें दोष किसका है ? [ १४६ ] हौं सब विधि राम, रावरो चाहत भयो चेरो। ठौर ठौर साहबी होत है, ख्याल काल कलि केरो ॥१॥ काल-करम-इंद्रिय-विषय गाहक गन घेरो। हौं न कबूलत, बाँधि कै मोल करत करेरो ॥२॥ बन्दि-छोर तेरो नाम है, बिरुदैत बड़ेरो। मैं कह्यो, तब छल-प्रीति कै माँगे उर डेरो ॥३॥ नाम-ओट अब लगि बच्यो मलजुग जग जेरो। अब गरीब जन पोषिये पाइबो न हेरो ॥४॥ जेहि कौतुक खग स्वान को प्रभु न्याव निबेरो। तेहि कौतुक कहिये कृपालु ! 'तुलसी है मेरो' ॥५॥ शब्दार्थ—करेरो = कड़ा। विरुदैत = बानावाले। मलजुग = कलियुग। जेरो = जेरबार करना, हैरान करना। निबेरो = फैसला किया। भावार्थ—हे रामजी! मैं सब प्रकारसे आपका सेवक होना चाहता हूँ। किन्तु यहाँ कलि-कालका ऐसा ख्याल है कि जगह-जगह साहबी हो रही है ॥१॥ (वह साहबी कौन कर रहा है, सो आगे कहते हैं) काल, कर्म और इन्द्रियोंके विषयरूपी ग्राहकोंने मुझे घेर लिया है। मैं कबूल नहीं करता, पर वे बाँधकर अथवा जबर्दस्ती (मुझे खरीद लेनेके लिए) कड़ा मोल करते हैं ॥२॥ आपका नाम बन्दीछोर (बन्धनसे मुक्त कर देनेवाला) है और आपका बाना भी बड़ा

विनय-पत्रिका २६३ है। जब मैंने उनसे कहा कि (मैं तो श्रीरामजीके हाथ बिकना चाहता हूँ, तब उन ग्राहकोंने) कपट-प्रेम दिखाकर मेरे हृदयमें डेरा डालनेके लिए स्थान माँगा ॥३॥ इस संसारमें कलियुगके जेरवार करनेसे अब तक तो मैं आपके नामकी ओटमें बचता आया, पर अब इस गरीब सेवककी आप रक्षा कीजिये; नहीं तो इसे ढूँढ़नेसे पाना कठिन हो जायगा, अर्थात् कलियुग इस दासका नाम-निशान मिटा देगा ॥४॥ हे प्रभो ! आपने जिस कौतुकसे पक्षी (उल्लू) और कुत्तेका फैसला किया था, उसी कौतुकसे हे कृपालु ! कह दीजिये कि तुलसी मेरा है ॥५॥ विशेष १—'खग'—कुछ प्रतियोंमें 'बक' पाठ मिलता है। पर अधिकांशमें 'खग' पाया जाता है। बक नाम है बगुलेका। बाल्मीकीय रामायणमें उल्लूका प्रसंग आया है। उसकी कथा इस प्रकार है—उल्लू और गीध जंगलमें एक ही घरमें रहते थे। एक दिन गीधने घरपर अधिकार करनेके इरादेसे उल्लूसे कहा,— हमारा घर खाली कर दो, इसपर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं। अन्तमें दोनों रामजीके दरबारमें अपने झगड़ेका फैसला कराने गये। रामजीने उल्लूसे पूछा,— 'घर किसका है ? तू उसमें कबसे रहता है ?' उल्लूने कहा,—'जबसे वृक्षोंकी सृष्टि हुई तभीसे मैं उस घरमें रहता हूँ।' गीधने कहा,—'और जबसे मानव- सृष्टि हुई, तबसे मैं रहता हूँ।' भगवान्ने गीधसे कहा,—'वृक्षोंकी सृष्टि मनुष्योंसे पहले हुई है, इसलिए वह घर उल्लूका है, तुम घर खाली कर दो।' २—'स्वान'—एक दिन रामजीकी सभामें एक कुत्ता आया, और रोकर कहने लगा,—'महाराज ! तीर्थसिद्ध नामक ब्राह्मणने मुझ निरपराधको लाठीसे मारा है।' भगवान्ने उक्त ब्राह्मणको बुलाया और उससे लाठी मारनेका कारण पूछा। ब्राह्मणने कहा,—मैं भीख माँग रहा था, इसे रास्तेसे हटाया; जब यह न हटा, तब मैंने लाठी मार दी।' भगवान्ने ब्राह्मणको अदण्डनीय समझकर कुत्तेसे ही पूछा कि इसे क्या दण्ड दिया जाय ? अन्तमें प्रभुजीने कुत्तेकी रायसे ही उस ब्राह्मणको कालिंजरका मठाधीश बनाकर दोनोंका झगड़ा तय किया। १. पाठान्तर 'बक'।

२६४ विनय-पत्रिका [ १४७ ] कृपासिंधु ताते रहौं निसिदिन मन मारे। महाराज ! लाज आपु ही निज जाँघ उघारे ॥१॥ मिले रहैं मान्यौ चहैं कामादि सँघाती। मो बिनु रहैं न, मेरिये जारैं छल छाती ॥२॥ बसत हिये हित जानि मैं सबकी रुचि पाली। कियो कथक को दंड हौं जड़ करम कुचाली ॥३॥ देखी सुनी न आजु लौं अपनायति ऐसी। करहिं सबै सिर मेरे ही फिरि परै अनैसी ॥४॥ बड़े अलेखी लखि परैं, परिहरे न जाहीं। असमंजस में मगन हौं, लीजै गहि बाहीं ॥५॥ बारक बलि अवलोकिये, कौतुक जन जी को। अनायास मिटि जाइगो संकट तुलसी को ॥६॥ शब्दार्थ—मन मारे = उदास। सँघाती = साथी। अनैसी = अनिष्ट, निषेध। अलेखी = विचित्र, दिखाई न पड़नेवाले। भावार्थ—हे कृपासिन्धु ! हे महाराज ! इसीसे मैं रात-दिन मन मारे रहता हूँ कि जंघा उघारना अपने ही लिए लज्जाकी बात है ॥१॥ ये काम-क्रोधादि साथी मिले भी रहते हैं और मारना भी चाहते हैं। ये मेरे बिना रहते भी नहीं और छलसे मेरी ही छाती जलाते हैं। तात्पर्य, जबतक मुझमें जीवन है, तभीतक इनका अस्तित्व है; इस प्रकार आश्रित रहते हुए भी ये मेरा ही सर्वनाश करते हैं ॥२॥ यह जानकर कि ये मेरे हृदयमें बसते हैं, मैंने सबकी रुचिका भी पालन किया, अर्थात् सब विषयोंको भोग लिया, फिर भी इन जड़ और कुचाली कर्मोंने मुझे कथककी लकड़ी बना रखा है। अर्थात्, जिस प्रकार कथक अपने लड़केको नाच सिखानेके लिए लाठीमें घुँघरू बाँधकर नचाता है, उसी तरह ये मुझे नचा रहे हैं। यहाँ लकड़ीकी चंचलतासे तात्पर्य है ॥३॥ आज- तक मैंने ऐसी पराधीनता देखी या सुनी नहीं कि कर्म तो करते हैं वे सब स्वयं, और लौटकर उस कर्मका अनिष्ट पड़ता है मेरे मत्थे। अर्थात् कर्म तो करती

हैं इन्द्रियाँ, और उन कर्मोंका फल भोगना पड़ता है मुझे ॥४॥ ये बड़े विचित्र दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि इन्हें छोड़ते नहीं बनता। हे प्रभो ! मैं असमंजसमें मग्न हो रहा हूँ, मेरी बाँह पकड़ लीजिये ॥५॥ आपकी बलैया लेता हूँ, एक बार इस दासके हृदयका कौतुक तो देख लीजिये। इतनेहीसे तुलसीदास- का संकट अनायास मिट जायगा ॥६॥

[१४८] कहौं कवन मुँह लाइ कै रघुबीर गुसाईं। सकुचत समुझत अपनी सब साईँ दुहाई ॥१॥ सेवत बस, सुमिरत सखा, सरनागत सो हौं । गुनगन सीतानाथके चित करत न हौं हौं ॥२॥ कृपासिंधु बंधु दीनके आरत-हितकारी। प्रनत-पाल बिरुदावली सुनि जानि विसारी ॥३॥ सेइ न धेइ न सुमिरि कै पद-प्रीति सुधारी। पाइ सुसाहिब रामसों, भरि पेट विगारी ॥४॥ नाथ गरीब-निवाज हैं, मैं गही न गरीबी। तुलसी प्रभु निज ओर तें बनि परै सो कीबी ॥५॥

शब्दार्थ- दुहाई = सौगन्ध । हौं = मैं। हौं = हूँ। धेइ = ध्येय । भरिपेट = पेटभर, अधिकसे अधिक । कीबी = कीजियेगा, कीजिये ।

भावार्थ- हे रघुवीर ! हे स्वामी ! मैं कौनसा मुँह लेकर आपसे कुछ कहूँ ? दुहाई स्वामीकी ! मैं अपनी करनी समझते ही सकुच जाता हूँ ॥१॥ आप सेवा करनेसे वशमें हो जाते हैं, स्मरण करनेसे मित्र बन जाते हैं और शरणागत होनेसे सम्मुख प्रकट हो जाते हैं। हे सीतानाथ ! आपके इन गुणोंपर ध्यान नहीं दे रहा हूँ ॥२॥ हे कृपासागर ! आप दीनोंके बन्धु हैं, दुखियोंका हित करनेवाले हैं और शरणागतोंका पालन करनेवाले हैं, आपकी इस विरुदावलीको सुन और जानकर भी मैंने आपको भुला दिया है ॥३॥ सेवा द्वारा, ध्यान द्वारा अथवा स्मरण द्वारा मैंने आपके चरणोंमें प्रेम नहीं किया। हे रामजी ! आपके समान अच्छा स्वामी पाकर भी मैंने खूब बिगाड़ डाला ॥४॥ हे नाथ ! आप तो

२६६ विनय-पत्रिका गरीबोंपर कृपा करनेवाले हैं, पर मैंने गरीबी अख्तियार नहीं की। हे प्रभो ! इस तुलसीके लिए आप अपनी ओरसे जो कुछ बन पड़े सो कीजिये ॥५॥ विशेष १—'भरि पेट बिगारी'—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि मैंने पेट भरनेमें ही सब बिगाड़ दिया अर्थात्, जन्मभर मुझे पेटके ही लाले पड़े रहे, कुछ भी करते-धरते न बना। [ १४९ ] कहाँ जाउँ, कासों कहौं, और ठौर न मेरे। जनम गँवायो तेरे ही द्वार किंकर तेरे ॥१॥ मैं तो बिगारी नाथ सों आरति के लीन्हें। तोहि कृपानिधि क्यों बनै मेरी-सी कीन्हें ॥२॥ दिन-दुरदिन दिन-दुरदसा, दिन-दुख दिन दूषन । जब लौं तू न बिलोकि है रघुबंस-विभूषन ॥३॥ दई पीठ बिनु डीठ मैं तुम बिस्व-विलोचन । तो सों तुही न दूसरो नत सोच-विमोचन ॥४॥ पराधीन देव दीन हौं, स्वाधीन गुसाईं। बोलनिहारे सों करै बलि बिनय कि झाँईं ॥५॥ आपु देखि मोहिं देखिये जन मानिय साँचो । बड़ी ओट रामनामकी जेहि लई सो बाँचो ॥६॥ रहनि रीति राम रावरी नित हिय हुलसी है। ज्यों भावै त्यों करु कृपा तेरो तुलसी है ॥७॥ शब्दार्थ—किंकर = दास । आरतिके लीन्हें = क्लेश-ग्रस्त होनेके कारण । डीठ = दृष्टि । नत = झुकनेपर, प्रणत । झाँईं = छाया । भावार्थ—कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ ? मेरे लिए तो और कहीं ठौर नहीं ! मैं तो आपका ही दास हूँ और आपहीके द्वारपर मैंने सारी जिन्दगी बितायी है ॥१॥ हे नाथ ! आपकी ओरसे मैंने तो बिगाड़ा है क्लेश-ग्रस्त होनेके कारण;

किन्तु हे कृपानिधि ! यदि आप भी मेरे जैसा ही करेंगे तो कैसे काम चलेगा ? ॥२॥ हे रघुवंश-विभूषण ! जबतक आप न देखेंगे (कृपा न करेंगे), तबतक नित्य-प्रति बुरे दिन रहेंगे, नित्य-प्रति दुर्दशा होती रहेगी , रोज-रोज दुःख होता रहेगा और नित्य दोष लगते रहेंगे ॥३॥ मैंने जो पीठ दी है (आपसे मुँह मोड़ा है), वह इसलिए कि मैं दृष्टिहीन (अन्धा) हूँ; किन्तु आप विश्व-विलोचन अर्थात् संसारके द्रष्टा हैं। हे भक्तोंके सोचको हरनेवाले, आपके समान आप ही हैं, दूसरा कोई नहीं ॥४॥ हे देव ! हे स्वामी ! मैं पराधीन हूँ, दीन हूँ और आप स्वाधीन हैं। मैं आपकी बलि जाऊँ। (आप ही कहिये कि) क्या छाया (कभी) बोलनेवालेसे विनय करती है (कर सकती है) ? ॥५॥ इसलिए पहिले आप अपनी ओर देखकर पीछे मेरी ओर देखिये, बादमें इस दासको सच्चा मानिये। जो राम-नामकी बड़ी आड़में हो गया अर्थात् जिसने राम-नामका प्रधान सहारा ले लिया, वह बच गया ॥६॥ हे रामजी ! आपकी रहन और रीति मेरे हृदयमें नित्य-प्रति उमड़ती रहती है; अतः जैसे रुचे वैसे कृपा कीजिये—यह तुलसी आपका है ॥७॥

विशेष

१—"बोलनिहारे......झाईं"—इसमें बड़ा ही गूढ़ अभिप्राय है। अर्थात् जैसे जड़ परछाईं कुछ नहीं कर सकती, वैसे ही परमात्माका प्रतिबिम्ब यह जीव भी स्वयं कुछ नहीं कर सकता। क्योंकि प्रतिबिम्ब तो बिम्बके आधारपर आचरण करता है। जैसा आचरण बिम्ब करता है, वैसा ही प्रतिबिम्बमें प्रतीत होता है। जैसे, जब हम खड़े होते हैं, तब हमारी छाया भी खड़ी हो जाती है; जब हम बैठते हैं तब परछाईं भी बैठ जाती है। हम जो भी चेष्टा करते हैं, सब छायामें प्रतीत होती है। ठीक वही दशा जीवकी है। इसी भावको लेकर गोस्वामीजीने कहा है कि आप जो कुछ करते हैं, वही इस जीवमें प्रतीत होता है। ऐसी दशामें यदि आप ईश्वर होकर इससे सेवा चाहें या इसकी करनी देखें, तो क्या उचित होगा ? क्योंकि यह तो आपके आश्रित है। इसीसे आगे एक चरणमें गोस्वामीजी कहते हैं कि हे नाथ ! पहले आप अपनी ओर देखकर पीछे मेरी ओर देखिये। धन्य गोस्वामीजी !

२६८ विनय-पत्रिका [ १५० ] रामभद्र ! मोहिं आपनो सोच है अरु नाहीं। जीव सकल संतापके भाजन जग माहीं ॥१॥ नातो बड़े समर्थ सों इक ओर किधौं हूँ। तो को मोसे अति घने मोको एकै तूँ ॥२॥ बड़ी गलानि हिय हानि है सर्बग्य गुसाँई । क्रूर कुसेवक कहत हौं सेवककी नाईं ॥३॥ भलो पोच राम को कहैं मोहिं सब नरनारी। बिगरे सेवक खान ज्यों साहिब-सिर गारी ॥४॥ असमंजस मनको मिटै सो उपाय न सूझै। दीनबन्धु ! कीजै सोई बनि परै जो बूझै ॥५॥ विरुदावली बिलोकिये तिन्हमें कोउ हौं हौं। तुलसी प्रभुको परिहन्यो सरनागत सो हौं ॥६॥ शब्दार्थ—रामभद्र = कल्याण । भाजन = पात्र । क्रूर = दुष्ट । पोच = बुरा, नीच । भावार्थ—हे कल्याण-स्वरूप रामजी ! मुझे अपना सोच है भी और नहीं भी है। क्योंकि संसारमें सब जीव दुःख-भाजन हैं; अर्थात् सोच तो इसलिए है कि हाय ! मेरा अभीतक उद्धार नहीं हुआ और निश्चिन्त इसलिए हूँ कि जीव- मात्रकी तो यही दशा है, फिर सोच किस बातका ? ॥१॥ क्या बड़े समर्थसे केवल एक ही (मेरी ही) ओरसे नाता है ? इसलिए कि आपके लिए मुझ-से बहुत हैं और मेरे लिए आप केवल एक ही हैं ? ॥२॥ किन्तु हे स्वामी ! आप तो सर्वज्ञ हैं—घट-घटकी जानते हैं, मुझे (इस बातकी) बड़ी ग्लानि है और उसे मैं अपने हृदयमें हानि भी समझता हूँ कि दुष्ट और बुरा सेवक होनेपर भी मैं सेवककी तरह आपसे कह रहा हूँ ॥३॥ मैं भला हूँ या बुरा, पर सब स्त्री-पुरुष मुझे रामजीका ही कहते हैं। कुत्तेकी तरह सेवकका भी काम बिगड़नेसे स्वामीके ही सिर गालियाँ पड़ती हैं (बस यही ग्लानि है) ॥४॥ मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं सूझ रहा है जिससे मेरे मनका असमंजस मिट जाय। अतः हे दीनबन्धु ! जो जान पड़े और हो सके, वही (मेरे लिए) कीजिये ॥५॥ आप अपनी बिरदावली-

विनय-पत्रिका २६१ की ओर देखिये, उसीमें कोई मैं भी होऊँगा। अर्थात् जिन अधमोंको आप तार चुके हैं, उनमें किसी-न-किसी अधमीकीसी ही अधमता मेरी भी होगी। हे प्रभो ! आपका त्यागा हुआ यह तुलसी आपकी शरणमें जाकर सामने ही रहेगा— अन्यत्र कहीं न जायगा ॥६॥ विशेष यह पद अत्यन्त भावपूर्ण और सच्चे हृदयोद्गारका सुन्दर द्योतक है। इसमें गुसाईंजीकी आन्तरिक भावना झलक रही है। १—'बड़ी·········नाईं'—इसका यह भी अर्थ हो सकता है कि 'मेरे हृदयमें ग्लानि है कि (मेरे कारण) सर्वज्ञ स्वामीकी हानि हो रही है। क्योंकि कुत्तेकी तरह सेवकका भी काम बिगड़नेपर स्वामीके ही सिर गालियाँ पड़ती हैं। किन्तु असली अर्थ वही है, जो भावार्थमें लिखा गया है। इसमें 'सर्वज्ञ' शब्द बड़ा ही सार्थक है। 'बड़ी ग्लानि है, हृदयमें हानि मानता हूँ' हे नाथ इसे आप समझ रहे हैं कि मैं सच कह रहा हूँ या नहीं। क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं। [ १५१ ] जौ पै चेराई राम की करतो न लजातो। तौ तू दाम कुदाम ज्यों कर-कर न बिकातो ॥१॥ जपत जीह रघुनाथ को नाम नहीं अलसातो। बाजीगर के सूम ज्यों खल खेह न खातो ॥२॥ जौ तू मन ! मेरे कहे राम-नाम कमातो। सीतापति सनमुख सुखी सब ठाँव समातो ॥३॥ राम सोहाते तोहिं जौ तू सबहिं सोहातो। काल करम कुल कारनी कोऊ न कोहातो ॥४॥ राम-नाम अनुराग ही जिय जो रतिआतो। स्वारथ-परमारथ-पथी तोहिं सब पतिआतो ॥५॥ सेइ साधु सुनि समुझि कै पर-पीर पिरातो। जनम कोटि को काँदलो हृद-हृदय थिरातो ॥६॥

६. दैन्य-निवेदन, आत्म-बोध व कलियुग उपद्रव

२७० विनय-पत्रिका भव-मग अगम अनंत है, बिनु श्रमहिं सिरातो । महिमा उलटे नाम की मुनि कियो किरातो ॥७॥ अमर-अगम तनु पाइ सो जड़ जाय न जातो । होतो मंगल-मूल तू, अनुकूल बिधातो ॥८॥ जो मन, प्रीति-प्रतीति सों राम-नामहिं रातो । तुलसी राम प्रसाद सों तिहुँ ताप न तातो ॥९॥ शब्दार्थ—चेराई = सेवा। सूम = कंजूस, कपड़ेका स्वरूप बनाकर बाजीगर जो तमाशा दिखाते हैं, उसे सूम कहते हैं। खेह = धूल। कारनी = कारण, प्रेरक। कोहातो = क्रोध करते, नाराज होते। रतिआतो = प्रीति करता, लगन लगाता। पतिआतो = विश्वास करते। पिरातो = दर्द होता। काँदलो = मलिनता। हृद = सरोवर। जाय = व्यर्थ। भावार्थ—(रे जीव !) यदि तू श्रीरामजीकी सेवा करनेमें न लज्जित होता, तो तू दाम (शुद्ध सुवर्ण) होकर कुदाम (ताँबा-पीतल) की तरह इस हाथसे उस हाथ न बिकता। अर्थात् तू परमात्माका अंश होकर अनेक योनियोंमें भटकता न फिरता ॥१॥ यदि तू जीभसे रघुनाथजीका नाम जपनेमें आलस्य न करता, तो रे खल ! तू बाजीगरके सूमकी तरह धूल न फाँकता ॥२॥ रे मन ! यदि तू राम-नामकी कमाई करता, तो सीतानाथके सम्मुख या प्रसन्न हो जानेसे तू सुखी हो जाता और सब जगह (लोक-परलोकमें) प्रवेश करता, अर्थात् लोक-परलोक दोनों ही बन जाते ॥३॥ यदि रामजी तुझे अच्छे लगते तो तू भी सबको भाता। फिर तो काल, कर्म आदि जितने कारणी हैं, कोई भी तुझपर क्रोध न करते ॥४॥ यदि तू हृदयसे राम-नामके अनुरागमें लगन लगाता, तो स्वार्थ और परमार्थ दोनोंके पथिक तुझपर विश्वास करते ॥५॥ यदि तू साधुकी सेवा करता, दूसरोंकी पीड़ा सुन और समझकर तुझे दर्द होता, तो करोड़ों जन्मकी मलिनता तेरे हृदय-सरोवरमें नीचे बैठ जाती ॥६॥ (उस दशामें) संसारका जो मार्ग अगम और अनन्त है, उसे तू बिना परिश्रमके ही पार कर जाता। (देख न) उलटे नामकी महिमाने किरात (बाल्मीकि) को मुनि बना दिया था ॥७॥ रे जड़ ! (फिर तो) तेरा देवताओंके लिए दुर्लभ शरीर पाना व्यर्थ न जाता, तू मंगल-मूल हो जाता, विधाता तेरे अनुकूल हो जाते ॥८॥ रे मन ! यदि तू प्रेम और विश्वाससे राम-

विनय-पत्रिका २७१ नामसे प्रेम करता, तो यह तुलसी श्रीरामजीके प्रसादसे तीनों तापोंसे तप्त न होता—जलता न ॥९॥ [ १५२ ] राम भलाई अपनी भल कियो न काको। जुगुजुग जानकिनाथ को जग जागत साको ॥१॥ ब्रह्मादिक बिनती करी कहि दुख बसुधाको। रवि-कुल-कैरव - चंद भो आनंद - सुधाको ॥२॥ कौसिक गरत तुषार ज्यों तकि तेज तियाको। प्रभु अनहित हित को दियो फल कोप कृपाको ॥३॥ हन्यो पाप आप जाइकै संताप सिलाको। सोच-मगन काढ्यो सही साहिब मिथिलाको ॥४॥ रोष-रासि भृगुपति धनी अहमिति ममता को। चितवत भाजन करि लियो उपसम समता को ॥५॥ मुदित मानि आयसु चले बन मातु-पिताको। धरम-धुरंधर धीर धुर गुन-सील-जिता को ? ॥६॥ गुह गरीब गतग्याति हू जेहि जिउ न भखाको ? । पायो पावन प्रेम तें सनमान सखा को ॥७॥ सदगति सबरी गीध की सादर करता को ? । सोच-सींव सुग्रीव के संकट हरता को ? ॥८॥ राखि बिभीषन को सकै अस काल-गहा को ? । आज बिराजत राज है दसकंठ जहाँ को ॥९॥ बालिस बासी अवध को बूझिये न खाको। सो पाँवर पहुँचे तहाँ जहँ मुनि-मन थाको ॥१०॥ गति न लहै राम-नाम सों विधि सों सिरजा को ? । सुमिरत कहत प्रचारि कै बल्लभ गिरिजा को ॥११॥ अकनि अजामिल की कथा सानंद न भा को ? । नाम लेत कलिकाल हू हरि पुरहिं न गा को ? ॥१२॥

२७२ विनय-पत्रिका राम-नाम-महिमा करै काम-भूरुह-आको। साखी वेद-पुरान हैं तुलसी-तन ताको ॥१३॥ शब्दार्थ—साको = यश। भो = हुए। कौसिक = विश्वामित्र। गरत = गलते थे। अन हित = यह शब्द ताड़काके लिए आया है। उपसम = शान्ति। गतग्याति = नीच जाति बालिस = मूढ़। खाको = खाक। थाको = थक जाता है। सिरजा = सृजा, बनाया। अकनि = अकनकर, सुनकर। भा = हुआ। गा = गया। भूरुह = वृक्ष। आको = आक, मन्दार। भावार्थ—रामजीने अपनी भलमनसाहतसे किसका भला नहीं किया ? संसारमें युग-युगसे जानकीनाथका यश जाग रहा है अर्थात् प्रसिद्ध है ॥१॥ ब्रह्मा आदिने पृथिवीका दुःख कहकर विनती की, और सूर्यवंशरूपी कुमुदिनीको प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्ररूप एवं अमृततुल्य आनन्दसे पूर्ण भगवान् रामजीने अवतार लिया ॥२॥ विश्वामित्र, ताड़काका तेज देखकर ओलेकी तरह गले जाते थे। प्रभुने अनहित (ताड़का) को हितका, और कोपका कृपा (के रूपमें) फल दिया। अर्थात्, ताड़काको मारा तो कुपित होकर शत्रुको तरह, पर उसे मुक्त कर दिया मित्रकी तरह ॥३॥ आपने अपनेसे जाकर शिला अहल्याका पाप-सन्ताप हर लिया और मिथिलाधिपति जनकजीको शोक-सागरमें डूबनेसे उबार लिया। अर्थात् धनुष तोड़कर उनकी चिन्ता दूर कर दी ॥४॥ परशुरामजी क्रोधके समूह और अहंता-ममताके धनी थे; उन्हें भी आपने अपनी दृष्टि डालते ही शान्ति और समताका पात्र बना लिया। अर्थात् वह क्रोध-रहित होकर शान्त हो गये और अहंकार एवं ममत्वको छोड़कर समद्रष्टा हो गये ॥५॥ आप माता- पिताकी आज्ञा मानकर प्रसन्नताके साथ वन चले गये। ऐसा धर्म-धुरन्धर, धीरज धारण करनेवाला तथा गुण-शीलको जीतनेवाला दूसरा कौन है ? ॥६॥ नीच जातिके गरीब गुहनिषादने भी, जो सब प्रकारके जीवोंको भक्षण करनेवाला था—पवित्र प्रेम और सखाके समान सम्मान पाया था ॥७॥ भला शबरी और गीध (जटायु) को आदरके साथ सद्गति कौन देता ? अत्यन्त शोकातुर सुग्रीवका संकट कौन हरण करता ? ॥८॥ कालका ग्रसा हुआ ऐसा कौन था जो विभीषण- को (अपनी शरणमें) रख सकता ? अर्थात्, किसके सिरपर काल सवार था जो रावणसे बैर मोल लेकर विभीषणको शरण देता ? किन्तु (रामजीकी कृपासे) आज भी वह राज्य (लंका) विराजमान है—जहाँका राजा रावण था ॥९॥ अयोध्या-

विनय-पत्रिका २७३ निवासी मूर्ख धोबी (जगज्जननी जानकीकी निन्दा करनेवाला), जिसमें खाक- पत्थर भी समझ न थी, अथवा जो खाककी तरह तुच्छ समझा जाता था, वह नीच भी उस स्थानपर पहुँच गया था जहाँ पहुँचनेमें मुनियोंका मन भी थक जाता है ॥१०॥ ब्रह्माने ऐसा किसे बनाया है, जो रामनामके प्रभावसे मुक्ति न पा सके। (रामनामका) स्मरण पार्वती-वल्लभ भगवान् शंकर करते हैं और दूसरोंसे कह-कहकर उसका प्रचार करते हैं ॥११॥ अजामिलकी कथा सुनकर कौन आनन्दित नहीं हुआ ? नाम लेते ही इस कलिकालमें भी ऐसा कौन है जो विष्णुलोकमें नहीं गया ? ॥१२॥ रामनामकी ऐसी महिमा है कि वह आकके पेड़को कल्पवृक्ष बना सकती है। इसके लिए वेद और पुराण साक्षी हैं; और फिर तुलसीके शरीरको देखो न ! (वह क्यासे क्या हो गया) ॥१३॥

[ १५३ ] मेरे रावरियै गति है रघुपति बलि जाउँ । निलज नीच निरधन निरगुन कहँ, जग दूसरो न ठाकुर ठाउँ ॥१॥ हैं घर घर बहु भरे सुसाहिब, सूझत सबनि आपनो दाउँ । बानर-बंधु विभीषन-हितु बिनु, कोसलपाल कहूँ न समाउँ ॥२॥ प्रनतारति-भंजन जन-रंजन, सरनागत पवि-पंजर नाउँ । कीजै दास दासतुलसी अब, कृपासिंधु बिनु मोल बिकाउँ ॥३॥

शब्दार्थ—रावरियै = आपकीही । ठाउँ = जगह । प्रनतारति (प्रणत + आरति) = भक्तोंका दुःख । पवि = वज्र ।

भावार्थ—हे रघुनाथजी ! बलिहारी, मुझे तो केवल आपकीही शरण है । मुझ निर्लज्ज, नीच, निर्धन और गुणहीनके लिए संसारमें न तो दूसरा कोई स्वामी है और न कोई स्थान ही है ॥१॥ यों तो घर-घरमें बहुत-से अच्छे-अच्छे स्वामी भरे पड़े हैं, किन्तु उन सबको अपना दाँव सूझता है । मैं तो बन्दरोंके बन्धु और विभीषणके हितू कोशलपाल रामजीको छोड़कर कहीं भी (किसी भी घरमें) नहीं समा सकता ॥२॥ आपका नाम भक्तोंके दुःखोंका नाशक, भक्तोंको सुख देने- वाला तथा शरणागतोंके लिए वज्रका बना हुआ पिंजरा है । हे कृपासिन्धु ! अब १८

२७४ विनय-पत्रिका आप तुलसीदासको अपना दास बना लीजिये—मैं बिना मोल (आपके हाथ) बिकना चाहता हूँ ! तात्पर्य यह है कि मैं निष्काम सेवक बनना चाहता हूँ॥३॥ [ १५४ ] देव ! दूसरो कौन दीन को दयालु । सील-निधान सुजान-सिरोमनि, सरनागत-प्रिय प्रनत-पालु ॥१॥ को समरथ सर्वग्य सकल प्रभु, सिव-सनेह-मानस-मरालु । को साहिब किये मीत प्रीति बस खग निसिचर कपि भील भालु॥२ नाथ हाथ माया-प्रपंच सब, जीव-दोष-गुन-करम-कालु । तुलसिदास भलो पोच रावरो, नेकु निरखि कीजिय निहालु॥३॥ भावार्थ—हे देव ! (आपके सिवा) दीनोंपर दया करनेवाला दूसरा कौन है ? आप शील-निधान, ज्ञानियोंमें शिरोमणि, शरणागतोंके परम प्रिय और भक्तों- के पालनेवाले हैं ॥१॥ आपके समान सामर्थ्यवान, सर्वज्ञ और सबका स्वामी कौन है ? आप शिवजीके स्नेहरूपी मानसरोवरमें (विहार करनेवाले) हंस हैं । (आपके सिवा) किस स्वामीने प्रेमवश पक्षी (जटायु), निशाचर (विभीषण), बन्दर (सुग्रीव), भील (निषाद) और भालुओं (जामवन्त आदि) को अपना मित्र बनाया है ? ॥२॥ हे नाथ ! मायाके प्रपंच, जीवोंके दोष, गुण कर्म और काल सब आपके हाथ हैं । यह तुलसीदास भला हो या बुरा, आपका ही है । जरा इसकी ओर देखकर इसे निहाल कर दीजिये ॥३॥ विशेष १—‘खग’—जटायु; २१५वें पदके विशेषमें देखिये । राग सारङ्ग [ १५५ ] बिस्वास एक राम-नाम को । मानत नहिं परतीति अनत ऐसोइ सुभाव मन वाम को ॥१॥ पढ़िबो परचो न छठी छ मत रिगु जजुर अथर्बन सामको । व्रत तीरथ तप सुनि सहमत पचि मरै करै तन छाम को ? ॥२॥

करम-जाल कलिकाल कठिन आधीन सुसाधित दाम को । ग्यान बिराग जोग जप तप भय लोभ मोह कोह काम को ॥३॥ सब दिन सब लायक भव गायक रघुनायक गुन-ग्राम को । बैठे नाम-कामतरु-तर डर कौन घोर घन घाम को ॥४॥ को जानै को जैहै जमपुर को सुरपुर पर-धाम को । तुलसिहिं बहुत भलो लागत जग जीवन राम-गुलाम को ॥५॥ शब्दार्थ—बाम = टेढ़े । पर्यो न छठी = भाग्यमें नहीं लिखा । छ रुत = छ शास्त्र । सहमत = सहम जाता है, सिकुड़ जाता है । छाम = दुर्बल । परधाम = बैकुण्ठ, ब्रह्मलोक । भावार्थ—मुझे एक राम-नामका ही विश्वास है। मेरे कुटिल मनका ऐसा ही स्वभाव है; वह (राम नामको छोड़कर) अन्यत्र विश्वास ही नहीं करता ॥१॥ छ शास्त्रों (न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त) का तथा ऋक्, यजु, साम और अथर्वण वेदोंका पढ़ना मेरे भाग्यमें नहीं लिखा है। व्रत, तीर्थ और तप आदिका नाम सुनकर मन सिकुड़ जाता है कि (इनमें) कौन पच-पचकर मरे और शरीरको क्षीण करे ॥२॥ कलिकालमें कर्म-जाल बड़ा ही कठिन है और उसे ठीक-ठीक साध लेना पैसेके अधीन है। रहे ज्ञान, वैराग्य, योग, जप और तप आदि, सो इनके करनेमें काम, क्रोध, लोभ, मोह आदिका भय है ॥३॥ संसारमें श्रीरघुनाथजीके गुणोंको गानेवाले सदा सब प्रकारसे योग्य हैं। क्योंकि राम-नाम-रूपी कल्पवृक्षके नीचे बैठे हुए लोगोंको कड़ी धूप (सांसारिक त्रितापों) का क्या डर है ? ॥४॥ कौन जानता है कि कौन यमपुरी (नरक) में जायगा, कौन स्वर्गमें जायगा और कौन ब्रह्मलोकमें जायगा ? तुलसीदासको तो इस संसारमें श्रीरामजीके गुलामका जीवन ही बहुत अच्छा लगता है ॥५॥ [ १५६ ] कलि नाम कामतरु राम को । दलनिहार दारिद दुकाल दुख, दोष घोर घन घाम को ॥१॥ नाम लेत दाहिनो होत मन, बाम विधाता वामको । कहत मुनीस महेस महातम, उलटे सीधे नाम को ॥२॥

२७६ विनय-पत्रिका भलो लोक-परलोक तासु जाके बल ललित-ललामको। तुलसी जग जानियत नाम ते सोच न कूच मुकामको ॥३॥ शब्दार्थ—कामतरु = कल्पवृक्ष । दुकाल = अकाल, दुर्भिक्ष । बाम = प्रतिकूल । दाहिनो = अनुकूल, प्रसन्न । ललित = सुन्दर । ललाम = सुन्दर, रम्य । भावार्थ—कलियुगमें रामनाम कल्पवृक्ष है। वह दरिद्रता, दुर्भिक्ष, दुःख और दोषको मिटानेवाला तथा सांसारिक त्रितापरूप घामके लिए घोर मेघरूप है ॥१॥ नाम लेते ही विधाताका प्रतिकूल मन भी अधमोंपर या भाग्यहीनोंपर अनुकूल हो जाता है। बड़े-बड़े मुनि और शिवजी भी उलटे-सीधे (किसी प्रकार भी अपनेसे) नामका (ऐसा ही) माहात्म्य कहते हैं, अर्थात् राम-नामरूपी लड्डू टेढ़ा-सीधा हर तरहका सर्वोत्तम है ॥२॥ जिसे ललित-ललाम (सुन्दर और रम्य) राम-नामका भरोसा है उसके लिए लोक-परलोक दोनों ही अच्छे हैं। हे तुलसी- दास ! नामके प्रभावसे इस संसारसे कूच करने अथवा इसमें रहनेका सोच नहीं होता। भाव यह है कि नामके प्रभावसे मनुष्यको जन्म-मरणकी चिन्ता ही नहीं रह जाती ॥३॥ विशेष १—'घोर घन घामको'—इसका अर्थ प्रखर धूप-सदृश त्रिताप भी हो सकता है। २—'बाम'—शब्दका अर्थ लिखा है 'अधमः' । इति सिद्धान्तकौमुद्या- मुणादिवृत्तिः । इस चरणका अर्थ इस प्रकार भी किया जा सकता है:—'प्रति- कूल विधाताका प्रतिकूल मन अनुकूल हो जाता है।' ३—'कहत मुनीस······नामको'—इसका यह अर्थ भी होता है कि 'मुनीश (वाल्मीकि) ने उलटे नामका और शिवजीने सीधे नामका माहात्म्य कहा है।' ४—'ललित-ललाम'—'ललित'का अर्थ है 'सुन्दर' और 'ललाम' का अर्थ मेदिनी कोषमें लिखा है:—'चिह्नम्, ध्वजः, शृंगम्, प्रधानम्, भूषा, रम्यम्, वालधिः, पुण्ड्रम्, तुरंगः, प्रभावः।' यहाँपर 'प्रधान' या 'रम्य' अर्थ ही अभिप्रेत है। वियोगी हरिजीने 'ललित-ललाम' का अर्थ किया है, "यह दोनों ही शब्द सुन्दरके बोधक हैं; सुन्दरसे भी सुन्दर।"

विनय-पत्रिका २९७ [ १५७ ] सेइये सुसाहिब राम सो । सुखद सुसील सुजान सूर सुचि, सुन्दर कोटिक काम सो ॥१॥ सारद सेस साधु महिमा कहैं, गुनगन-गायक साम सो । सुमिरि सप्रेम नाम जासों रति चाहत चन्द्र-ललाम सो ॥२॥ गमन विदेस न लेस कलेस को, सकुचत सकृत प्रनाम सो । साखी ताको विदित विभीषन, बैठो है अबिचल धाम सो ॥३॥ टहल सहल जन महल-महल, जागत चारो जुग जाम सो । देखत दोष न खीझत, रीझत सुनि सेवक गुन-ग्राम सो ॥४॥ जाके भजे तिलोक-तिलक भये, त्रिजग जोनि तनु ताम सो । तुलसी ऐसे प्रभुहि भजै जो न ताहि विधाता बाम सो ॥५॥ शब्दार्थ—साम = सामवेद । चन्द्र-ललाम = जिनके चन्द्रमा भूषण हैं, अर्थात् शिवजी । टहल = सेवा । सहल = आसान । त्रिजग = तिर्यक् योनि, पशु-पक्षी । भावार्थ—राम-सरीखे सुन्दर स्वामीकी सेवा करनी चाहिये । वह सुख देने- वाले, सुशील, चतुर, वीर, पवित्र और करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक सुन्दर हैं ॥१॥ सरस्वती, शेष और सन्तजन उनकी महिमा कहते हैं, और उनके गुणों- को गानेवाले सामवेद-सरीखे हैं । बड़े प्रेमके साथ नामका स्मरण करते हुए शिवजी-सरीखे (देवाधिदेव) जिनसे प्रेम करना चाहते हैं ॥२॥ जिन्हें विदेश- गमन (वन-यात्रा) करते समय रंचमात्र भी क्लेश नहीं हुआ । जो एक बार प्रणाम करनेसे ही सकुच जाते हैं और इसका साक्षी विभीषण प्रसिद्ध है जो कि आज भी लंकामें अविचल भावसे बैठा हुआ है ॥३॥ जिनकी टहल बहुत आसान है, जो भक्तोंके घट-घटमें चारों युगमें चारों पहर जागते रहते हैं; जो भक्तोंके दोष देखकर भी नहीं खीझते, किन्तु सेवकोंकी गुणावली सुनकर ही (देखनेको कौन कहे) रीझ जाते हैं ॥४॥ जिसे भजकर तिर्यक् योनिके पशु-पक्षी तथा तामसी शरीरवाले (राक्षस) तीनों लोकोंके तिलक हो गये, तुलसीदास कहते हैं कि ऐसे प्रभुको जो लोग नहीं भजते, विधाता उनके प्रतिकूल हैं, अर्थात् उनका दुर्भाग्य है ॥५॥

२७८ विनय-पत्रिका राग नट १५८ ] कैसे देउँ नाथहिं खोरि । काम-लोलुप भ्रमत मन हरि भगति परिहरि तोरि ॥१॥ बहुत प्रीति पुजाइबे पर, पूजिबे पर थोरि । देत सिख सिखयो न मानत, मूढ़ता असि मोरि ॥२॥ किये सहित सनेह जे अघ हृदय राखे चोरि । संग-बस किये सुभ सुनाये सकल लोक निहोरि ॥३॥ करौं जो कछु धरौं सचि-पचि सुकृत सिला बटोरि । पैठि उर बरवस दयानिधि दंभ लेत अँजोरि ॥४॥ लोभ, मनहिं नचाव कपि ज्यों, गरे आसा-डोरि । बात कहौं बनाइ बुध ज्यों, वर बिराग निचोरि ॥५॥ एतेहुँ पर तुम्हरो कहावत, लाज अँचई घोरि । निलजता पर रीझि रघुबर, देहु तुलसिहिं छोरि ॥६॥ शब्दार्थ—खोरि = दोष । सचि-पचि = बड़े यत्नसे । सिला = खेतमें पड़े हुए दाने । अँजोरि = खोज लेता है । बुध = पण्डित । निचोरि = निचोड़कर, सारांश । अँचई = पी गया । भावार्थ—नाथको कैसे दोष दूँ ! हे हरे ! मेरा मन आपकी भक्ति छोड़कर काम-लोलुप बना फिरता है ॥१॥ अपने पुजानेमें तो मेरी बड़ी प्रीति है, किन्तु आपकी पूजा करनेमें बहुत कम प्रेम है। मेरी ऐसी मूर्खता है कि मैं दूसरोंको तो खूब शिक्षा देता हूँ, पर स्वयं किसीका सदुपदेश नहीं मानता ॥२॥ मैंने जिन पापोंको बड़े स्नेहसे किया है, उन्हें तो हृदयमें चुरा रखा है, किन्तु सत्संगमें पड़कर यदि कोई शुभ कर्म किया है तो उसे सब लोगोंको निहोरा करके सुनाया है ॥३॥ जो कुछ शुभ कर्म करता हूँ उसे खेतमें पड़े हुए दानेकी तरह बटोरकर रखता हूँ; किन्तु हे दयानिधि ! दम्भ मेरे हृदयमें जबर्दस्ती पैठकर उसे भी खोज लेता है। अर्थात् दम्भके कारण उन शुभ कर्मोंको लोगोंसे कह-कहकर पुण्य क्षय कर डालता हूँ ॥४॥ लोभ मेरे मनको बन्दरकी तरह उसके गलेमें

विनय-पत्रिका २७९ आशाकी डोरी डालकर नचा रहा है। (इतनेपर भी मैं) पण्डितोंकी तरह श्रेष्ठ वैराग्यके तत्त्वकी बातें बना-बनाकर कहता हूँ ॥५॥ इतनेपर भी मैं लज्जाको ऐसा घोलकर पी गया हूँ कि आपका (दास) कहलाता हूँ। अतः हे रघुनाथजी ! आप इस निर्लज्जतापर रीझकर तुलसीको छोड़ दीजिये—संसार-जालसे मुक्त कर दीजिये ॥६॥ विशेष १—'निलजता……छोरि'—कहनेका यह आशय है कि जिस प्रकार बहुरूपियेकी नकल देखकर राजा प्रसन्न होता और गहरा इनाम देता है, उसी प्रकार हे रामजी, तुलसीदासके ढोंगपर प्रसन्न होकर पुरस्कार-स्वरूप उसके गले- में जो लोभने आशाकी डोरी डाल रखी है उसे छोड़ दीजिये । [१५९] है प्रभु ! मेरोई सब दोसु । सील-सिंधु, कृपालु, नाथ-अनाथ, आरत-पोसु ॥१॥ बेष बचन बिराग मन अघ अवगुननि को कोसु । राम प्रीति-प्रतीति पोली, कपट-करतब ठोसु ॥२॥ राग-रंग कुसंग ही सों, साधु-संगति रोसु । चहत केहरि-जलहिं सेइ सृगाल ज्यों खरगोसु ॥३॥ संभु-सिखवन रसन हूँ नित राम-नामहिं घोसु । दंभहू कलि नाम कुंभज सोच-सागर-सोसु ॥४॥ मोद-मंगल-मूल. अति अनुकूल निज निरजोसु । रामनाम प्रभाव सुनि तुलसिहुँ परम परितोसु ॥५॥ शब्दार्थ—पोसु = पोषक। कोसु = कोश, खजाना। पोली = पोला, खोखला। रोसु = क्रोध। घोषु = घोष, शब्द, रट लगा। निरजोसु = असुख। भावार्थ—हे प्रभो ! सब दोष मेरा ही है। आप शीलके समुद्र, कृपालु, अनाथोंके नाथ और दीन-दुखियोंका पोषण करनेवाले हैं ॥१॥ मेरे वेष और वचनमें तो वैराग्य दिखता है, पर मेरा मन पापों और दुर्गुणोंका खजाना है। हे रामजी ! आपपर मेरा जो प्रेम और विश्वास है, वह तो पोला है, किन्तु

२८० विनय-पत्रिका कपटका कर्त्तव्य खूब ठोस है ॥२॥ मैं कुसंगीहीसे तो प्रेम करता हूँ और साधु- संगतिसे क्रोध । (मेरी यह मूर्खता ठीक वैसी ही है) जैसे खरगोश सियारकी सेवा करके सिंहका यश चाहता है। भाव यह है कि जैसे सिंहकी कीर्त्तिके लोभमें पड़कर खरगोश सेवा ही करते-करते सियारका भक्षण बन जाता है, उसी प्रकार जो मनुष्य कुसंगमें पड़कर कीर्त्ति कमाना चाहता है, उसका भी सर्वनाश हो जाता है—कीर्त्ति तो दूर रही ॥३॥ शिवजीका उपदेश है कि ‘जीभसे नित्य राम-नामकी रट लगाया कर । क्योंकि कलियुगमें दम्भसे भी (नाम लेनेपर) नामरूपी अगस्त्य सोचरूपी समुद्रको सोख लेता है ॥४॥ रामनाम अत्यन्त अनु- कूल तथा आनन्द और कल्याणकी जड़ है, अपना (शिवजीका) यही निष्कर्ष है।’ रामनामका ऐसा प्रभाव सुनकर तुलसीदासको भी परम सन्तोष है ॥५॥ विशेष १—‘दम्भ हू......सोसु’—वास्तवमें नियमित रूपसे राम-नामकी रट लगानेकी ऐसी ही महिमा है। बहुतोंकी यह धारणा है कि जबतक अन्तःकरण शुद्ध नहीं हो जाता, मनमें एकाग्रता नहीं आ जाती, तबतक ‘राम-राम’ कहकर चिल्लानेसे कुछ नहीं होता। किन्तु ऐसा कथन शुष्क और तार्किक ज्ञानियोंका है। सचमुच ही राम-नामकी ऐसी महिमा है कि नियमित रूपसे छ महीने- तक प्रतिदिन कमसे कम तीन घण्टा राम-नामकी रट लगानेपर प्रत्येक मनुष्यका अन्तःकरण शुद्ध होकर मन स्थिर हो सकता है। यही तो राम-नामकी अपूर्वता है। परीक्षा करनेवालोंको ही इसकी सत्यताका पता चल सकता है। इस युगमें सबसे उत्तम और सरल साधन यही है। २—‘निरजोसु’—का अर्थ वियोगी हरिजीने ‘निश्चय’ लिखा है। पता नहीं कि यह अर्थ कैसे निकाला है। वास्तवमें इसका अर्थ है ‘निष्कर्ष’ यह शब्द ‘निर्यूष’ का अपभ्रंश है। [ १६० ] मैं हरि पतित-पावन सुने । मैं पतित तुम पतित-पावन दोउ बानक बने ॥१॥

विनय-पत्रिका २८१ व्याध गनिका गज अजामिल साखि निगमनि भने। और अधम अनेक तारे जात कापै गने ॥२॥ जानि नाम अजानि लीन्हे नरक जमपुर मने। दास तुलसी सरन आयो, राखिये आपने ॥३॥ शब्दार्थ—बानक = व्यापारी। निगम = वेद। भने = कहे हैं। मने = मनाही। भावार्थ—हे हरे ! मैंने सुना है कि तुम पतित-पावन हो। इसलिए मैं पापी हू और तुम पापियोंको पवित्र करनेवाले हो, दोनों (एक-दूसरेके खूब) बानक (व्यापारी) बन गये। अर्थात् मुझे पतित-पावनकी जरूरत है और तुम्हें पतित- की। मेल खूब मिला ॥१॥ वेदोंने कहा है कि (धर्म नामक) व्याध, गणिका (पिंगला वेश्या), गजेन्द्र और अजामिल (इस बातके) साक्षी हैं (कि तुम पतित- पावन हो)। तुमने और भी बहुत-से अधमों-(पापियों) को तारा है, भला वे किससे गिने जा सकते हैं ? ॥२॥ जानकर या बिना जाने तुम्हारा नाम लेनेसे यमराजकी पुरी नरकमें जानेकी मनाही कर दी जाती है। अतः यह सेवक तुलसीदास आपकी शरणमें आया है, इसे अपनी शरणमें रख लीजिये ॥३॥ विशेष १—'व्याध'—वियोगी हरिजी तथा अन्यान्य टीकाकारोंने इस शब्दसे 'वाल्मीकि' अर्थ निकाला है। किन्तु गणिका, गजेन्द्र और अजामिलकी श्रेणीमें महर्षि वाल्मीकि नहीं आ सकते। अजामिल इत्यादि घोर पापी थे, उनके पिछले जन्मके किसी कर्मका फल उदय हुआ और वे एक बार भगवान्‌का नाम मुखसे निकलते ही तर गये; किन्तु वाल्मीकिको अपना कुत्सित मार्ग छोड़कर अनन्त कालतक तपस्या करनेकी आवश्यकता पड़ी थी। अतः गणिका अजामिल आदिकी श्रेणीमें 'व्याध' का अर्थ 'वाल्मीकि' न करके 'धर्म' नामक व्याध अर्थ करना ही संगत प्रतीत होता है। क्योंकि धर्म नामक व्याधको भी उसी प्रकार गति मिली थी, जिस प्रकार गणिका, गजेन्द्र और अजामिलको। २—'गनिका'—पिंगला; ९४ पदके विशेषमें देखिये। ३—'अजामिल'—५७ पदके विशेषमें देखिये। ४—'जानि……मने'—इसका आशय यह है कि जो लोग राम-नामकी