भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 272, कुल 475 में से

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पृष्ठ 272

विनय-पत्रिका २६१ प्रकट रूपमें स्वामीको पुकारा ॥५॥ (यदि आप कहें कि और देवताओंसे फरि- याद क्यों नहीं की, तो बात यह है कि और सब) देवता स्वार्थी, असमर्थ, अयोग्य और निष्ठुर हैं, उनके चित्तमें दया नहीं है। इसलिए मैं कहाँ जाऊँ ? कौन मेरी विपत्तियोंका निवारण करनेवाला है ? संसारमें (आपके सिवा) ऐसा कौन है जो संसारसे तार सकता है ? ॥६॥ यद्यपि यह तुलसीदास नीच है, फिर भी आपका है—और किसीका भी नहीं। अतः एक बार भक्तिरूपी बाँह दे दीजिये, जिससे अब यह खेड़ा (गाँव) अच्छी तरह बस जाय; अर्थात् भजन, विवेक, वैराग्य आदि हृदयमें स्थित हो जायँ ॥७॥ विशेष १—'गज'—पद ५७ के विशेषमें देखिये। २—'प्रह्लाद'—पद ९३ के विशेषमें देखिये। ३—'पांडुसुत'—पाण्डवोंके हित-साधनके लिए भगवान्‌ने सब-कुछ किया था। उनके दूत बनकर वह दुर्योधनके पास गये, द्रौपदीकी पुकार सुनकर उसके सहायक हुए, युद्धक्षेत्रमें अर्जुनके सारथी बने। ४—'विभीषण'—जब विभीषणने रावणसे कहा कि रामजी साक्षात् परमात्मा हैं और जानकीजी जगज्जननी हैं, अतः तुम जानकीजीको उनके पास लौटाकर क्षमा माँगो, तब रावणने विभीषणको लात मारकर अपने नगरसे बाहर निकाल दिया। उस समय विभीषण बहुत भयभीत हुआ। उसने निराश होकर अपने मनमें कहा— जिन पायनिकी पादुकनि, भरत रहे मन लाइ । ते पद आजु विलोकिहौं, इन नैननि अब जाइ ॥ यही सोचकर विभीषण भगवान् श्रीरामके चरणोंमें आ गिरा। भगवान्‌ने उठकर बड़े प्रेमके साथ उसे हृदयसे लगा लिया। गुसाईंजी रामचरित-मानस- में लिखते हैं :— अस कहि करत दण्डवत देखी। तुरत उठे प्रभु हर्ष बिसेखी। दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदय लगावा ॥

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