भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 271

२६० विनय-पत्रिका सुर स्वारथी, अनीस, अलायक, निठुर, दया चित नाहीं। जाउँ कहाँ, को बिपति-निवारक, भवतारक जग माहीं ॥६॥ तुलसी जदपि पोच, तउ तुम्हरो, और न काहू केरो। दीजै भगति-बाँह बारक, ज्यों सुबस बसै अब खेरो ॥७॥ शब्दार्थ—दादि = न्याय। दाहे = भस्म कर दिया। बरिआईं = जबर्दस्ती। अनीस = असमर्थ, निःशक्त। पोच = नीच। खेरो = खेड़ा, छोटा गाँव। भावार्थ—हे कृपासिन्धु ! यह दीन दास आपके द्वारपर न्याय क्यों नहीं पा रहा है? जब और जहाँ कहीं भी दुखियोंने आपको पुकारा, वहीं आपने उनके दुःखोंको भस्म कर डाला ॥१॥ आपने गजराज, प्रह्लाद, पांडव, कपि (सुग्रीव) आदि सब लोगोंका शत्रु-संकट दूर कर दिया। भाई-(रावण) के भय- से व्याकुल विभीषणके शरणमें आते ही आपने उठकर, उसे भरतकी नाईं हृदयसे लगा लिया ॥२॥ मैं आपका नाम ले-लेकर अपने हृदयमें एक गाँव बसाता हूँ। (उसमें बसनेके लिए) क्रम-क्रमसे भजन, विवेक, वैराग्य आदि अच्छे- अच्छे लोगोंको ला रहा हूँ। अर्थात्, मैं आपके नामके भरोसे अपने हृदयमें विवेक वैराग्य आदि सद्गुणोंको स्थान दे रहा हूँ ॥३॥ यह सुनकर क्रोधसे भरे हुए काम-क्रोधादि जबर्दस्ती जोर कर रहे हैं; और उन्हें (विवेक, वैराग्यादिको) उजाड़कर हे नाथ श्रीरामजी ! स्त्री, शत्रु, धन आदिको उस पुरमें बसाते हैं। भाव यह कि ज्यों-ज्यों मैं अपने हृदयमें सद्भावोंको भरना चाहता हूँ, त्यों-त्यों दुर्भाव जोर पकड़ते जाते हैं ॥४॥ समता (प्रेमपूर्वक मेल), सेवा, छल, दान (उनकी रुचिके अनुसार विषय) और दंड (योगादि साधन) आदि अनेक उपाय करके मैं थक गया; अर्थात् पहले मैंने काम-क्रोधादिसे समताका भाव प्रकट किया, जब उन्होंने नहीं माना, तब मैंने उनकी अधीनता दिखलायी; किन्तु जब उससे भी काम सिद्ध न हुआ तो छल किया (यानी उनकी रुचिके अनुसार वस्तु देनेके लिए कहकर उसे दिया नहीं), फिर भी कोई फल न हुआ, तब उन्हें उनकी इच्छा- के अनुसार विषय दिया, जब वे इससे भी शान्त न हुए तो योगादि साधनोंसे उन्हें निर्बल करना चाहा; किन्तु इसका भी कोई फल न हुआ। यह कलह बिना कारणके है; अतः मुझे बड़ा दुःख है। इसीसे मैंने (लाचार होकर अन्तमें)

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