भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 270

विनय-पत्रिका २५९ प्रसिद्ध है कि ब्राह्मण-बन्धु अजामिल पापका घर था; किन्तु पुत्रके बहाने (नारायण) नामका स्मरण करते ही आपने उसे घोर यमलोकमें जानेसे उबार लिया ॥२॥ जब ग्राहने आकर पशु, पापी एवं महा अभिमानी गजको ग्रस लिया, तब उसके एक बार स्मरण करते ही आपने शीघ्रतासे आकर उसके हृदयकी दुस्सह ज्वालाको हर लिया ॥३॥ व्याध, निषाद, गीध और गणिका आदि अगणित अवगुणोंकी जड़ थे; किन्तु हे राम ! आपने अपने नामकी आड़से इन सबके तमाम कष्टोंको दूर कर दिया ॥४॥ हे रघुकुल-भूषण महाराज रामचन्द्रजी ! मैं इन लोगोंसे किस आचरणमें कम हूँ, जिससे यह तुलसीदास (अज्ञानके) भीषण अन्ध-कूपमें पड़ा रात-दिन दुःख पा रहा है ॥५॥ विशेष १—'अजामिल'—पद ५७ के विशेषमें देखिये । २—'गज...ग्राह'—पद ५७ के विशेषमें देखिये । ३—'व्याध'—पद ९४ के विशेषमें देखिये । ४—'निषाद'—गुह; पद १०६ के विशेषमें देखिये । ५—'गणिका'—पिंगला; पद ९४ के विशेषमें देखिये । [१४५] कृपासिंधु ! जन दीन दुआरे दादि न पावत काहे । जब जहँ तुमहिं पुकारत आरत, तहँ तिन्हके दुख दाहे ॥१॥ गज, प्रहलाद, पांडुसुत, कपि, सबको रिपु-संकट मेट्यो । प्रनत बन्धु-भय-बिकल, विभीषन, उठि सो भरत ज्यों भेंट्यो॥२॥ मैं तुम्हरो लेइ नाउँ गाउँ इक उर आपने बसावौं । भजन, बिबेक, बिराग, लोग भले, मैं क्रम-क्रम करि ल्यावौं ॥३॥ सुनि रिस भरे कुटिल कामादिक, करहिं जोर बरिआईं । तिन्हहिं उजारि नारि-अरि-धन पुर राखहिं राम गुसाईं ॥४॥ सम-सेवा-छल-दान-दण्ड हौं, रचि उपाय पचि हार्यो । बिनु कारनको कलह बड़ो दुख, प्रभु सों प्रगटि पुकार्यो ॥५॥