भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 269

२५८ विनय-पत्रिका दूसरोंके हाथ बेचकर जबरदस्ती उनका गुलाम हो जाता है॥५॥ यदि कभी संगके प्रभावसे सुमार्गके समीप जाता भी हूँ, तो कुत्सित मनोरथोंका संग अर्थात् विषयासक्ति क्रुद्ध होकर गहरी अड़चन डाल देती है ॥६॥ एक तो मैं दीन, मलीन और मन्दबुद्धि हूँ, विपत्तियोंके जालमें खूब घिरा हुआ हूँ, तिसपर हे करुणानिधि ! मनका दुस्सह धक्का सहा नहीं जाता ॥७॥ मैं अनेक यत्न करके हारकर गिर गया, इससे पहले ही कहे देता हूँ कि तुलसीदासका यह त्रास तभी मिटेगा, जब आप उसके हृदयमें डेरा डालेंगे ॥८॥ विशेष १—वियोगी हरिजीने 'अनेरो'का अर्थ 'अन्यत्र, दूर, विमुख' और 'भटभेरो' का अर्थ 'धक्का' लिखा है। समझमें नहीं आता कि उक्त टीकाकारने ऐसा ऊट- पटाँग अर्थ कैसे लिख डाला है । [१४४] सो धौं को जो नाम-लाज तें, नहिं राख्यो रघुबीर । कारुनीक बिनु कारन ही हरि हरी सकल भव-भीर ॥१॥ वेद-विदित, जग-विदित अजामिल विप्रबंधु अघ धाम । घोर जमालय जात निवार्यो सुत-हित सुमिरत नाम ॥२॥ पसु पामर अभिमान-सिंधु गज ग्रस्यो आइ जब ग्राह । सुमिरत सकृत सपदि आये प्रभु, हन्यो दुसह उर-दाह ॥३॥ ब्याध, निषाद, गीध, गनिकादिक, अगनित औगुन-मूल । नाम ओटतें राम सबनि की दूरि करी सब सूल ॥४॥ केहि आचरन घाटि हौं तिनतें, रघुकुल-भूषण भूप । सीदत तुलसिदास निसिबासर पर्यो भीम तम-कूप ॥५॥ शब्दार्थ—सकृत = एक बार । सपदि = शीघ्र । घाटि = कम, घटकर । सीदत = दुःख पा रहा है । भावार्थ—ऐसा कौन है जिसे रामजीने अपने नामकी लजासे नहीं रख लिया (नहीं अपनाया), और अकारण ही परम कारुणिक भगवान्ने उसकी तमाम सांसारिक झंझटोंको नहीं हर लिया ? ॥१॥ वेदोंमें विदित है और संसारमें भी