विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
२५८ विनय-पत्रिका दूसरोंके हाथ बेचकर जबरदस्ती उनका गुलाम हो जाता है॥५॥ यदि कभी संगके प्रभावसे सुमार्गके समीप जाता भी हूँ, तो कुत्सित मनोरथोंका संग अर्थात् विषयासक्ति क्रुद्ध होकर गहरी अड़चन डाल देती है ॥६॥ एक तो मैं दीन, मलीन और मन्दबुद्धि हूँ, विपत्तियोंके जालमें खूब घिरा हुआ हूँ, तिसपर हे करुणानिधि ! मनका दुस्सह धक्का सहा नहीं जाता ॥७॥ मैं अनेक यत्न करके हारकर गिर गया, इससे पहले ही कहे देता हूँ कि तुलसीदासका यह त्रास तभी मिटेगा, जब आप उसके हृदयमें डेरा डालेंगे ॥८॥ विशेष १—वियोगी हरिजीने 'अनेरो'का अर्थ 'अन्यत्र, दूर, विमुख' और 'भटभेरो' का अर्थ 'धक्का' लिखा है। समझमें नहीं आता कि उक्त टीकाकारने ऐसा ऊट- पटाँग अर्थ कैसे लिख डाला है । [१४४] सो धौं को जो नाम-लाज तें, नहिं राख्यो रघुबीर । कारुनीक बिनु कारन ही हरि हरी सकल भव-भीर ॥१॥ वेद-विदित, जग-विदित अजामिल विप्रबंधु अघ धाम । घोर जमालय जात निवार्यो सुत-हित सुमिरत नाम ॥२॥ पसु पामर अभिमान-सिंधु गज ग्रस्यो आइ जब ग्राह । सुमिरत सकृत सपदि आये प्रभु, हन्यो दुसह उर-दाह ॥३॥ ब्याध, निषाद, गीध, गनिकादिक, अगनित औगुन-मूल । नाम ओटतें राम सबनि की दूरि करी सब सूल ॥४॥ केहि आचरन घाटि हौं तिनतें, रघुकुल-भूषण भूप । सीदत तुलसिदास निसिबासर पर्यो भीम तम-कूप ॥५॥ शब्दार्थ—सकृत = एक बार । सपदि = शीघ्र । घाटि = कम, घटकर । सीदत = दुःख पा रहा है । भावार्थ—ऐसा कौन है जिसे रामजीने अपने नामकी लजासे नहीं रख लिया (नहीं अपनाया), और अकारण ही परम कारुणिक भगवान्ने उसकी तमाम सांसारिक झंझटोंको नहीं हर लिया ? ॥१॥ वेदोंमें विदित है और संसारमें भी
विनय-पत्रिका २५९ प्रसिद्ध है कि ब्राह्मण-बन्धु अजामिल पापका घर था; किन्तु पुत्रके बहाने (नारायण) नामका स्मरण करते ही आपने उसे घोर यमलोकमें जानेसे उबार लिया ॥२॥ जब ग्राहने आकर पशु, पापी एवं महा अभिमानी गजको ग्रस लिया, तब उसके एक बार स्मरण करते ही आपने शीघ्रतासे आकर उसके हृदयकी दुस्सह ज्वालाको हर लिया ॥३॥ व्याध, निषाद, गीध और गणिका आदि अगणित अवगुणोंकी जड़ थे; किन्तु हे राम ! आपने अपने नामकी आड़से इन सबके तमाम कष्टोंको दूर कर दिया ॥४॥ हे रघुकुल-भूषण महाराज रामचन्द्रजी ! मैं इन लोगोंसे किस आचरणमें कम हूँ, जिससे यह तुलसीदास (अज्ञानके) भीषण अन्ध-कूपमें पड़ा रात-दिन दुःख पा रहा है ॥५॥ विशेष १—'अजामिल'—पद ५७ के विशेषमें देखिये । २—'गज...ग्राह'—पद ५७ के विशेषमें देखिये । ३—'व्याध'—पद ९४ के विशेषमें देखिये । ४—'निषाद'—गुह; पद १०६ के विशेषमें देखिये । ५—'गणिका'—पिंगला; पद ९४ के विशेषमें देखिये । [१४५] कृपासिंधु ! जन दीन दुआरे दादि न पावत काहे । जब जहँ तुमहिं पुकारत आरत, तहँ तिन्हके दुख दाहे ॥१॥ गज, प्रहलाद, पांडुसुत, कपि, सबको रिपु-संकट मेट्यो । प्रनत बन्धु-भय-बिकल, विभीषन, उठि सो भरत ज्यों भेंट्यो॥२॥ मैं तुम्हरो लेइ नाउँ गाउँ इक उर आपने बसावौं । भजन, बिबेक, बिराग, लोग भले, मैं क्रम-क्रम करि ल्यावौं ॥३॥ सुनि रिस भरे कुटिल कामादिक, करहिं जोर बरिआईं । तिन्हहिं उजारि नारि-अरि-धन पुर राखहिं राम गुसाईं ॥४॥ सम-सेवा-छल-दान-दण्ड हौं, रचि उपाय पचि हार्यो । बिनु कारनको कलह बड़ो दुख, प्रभु सों प्रगटि पुकार्यो ॥५॥
२६० विनय-पत्रिका सुर स्वारथी, अनीस, अलायक, निठुर, दया चित नाहीं। जाउँ कहाँ, को बिपति-निवारक, भवतारक जग माहीं ॥६॥ तुलसी जदपि पोच, तउ तुम्हरो, और न काहू केरो। दीजै भगति-बाँह बारक, ज्यों सुबस बसै अब खेरो ॥७॥ शब्दार्थ—दादि = न्याय। दाहे = भस्म कर दिया। बरिआईं = जबर्दस्ती। अनीस = असमर्थ, निःशक्त। पोच = नीच। खेरो = खेड़ा, छोटा गाँव। भावार्थ—हे कृपासिन्धु ! यह दीन दास आपके द्वारपर न्याय क्यों नहीं पा रहा है? जब और जहाँ कहीं भी दुखियोंने आपको पुकारा, वहीं आपने उनके दुःखोंको भस्म कर डाला ॥१॥ आपने गजराज, प्रह्लाद, पांडव, कपि (सुग्रीव) आदि सब लोगोंका शत्रु-संकट दूर कर दिया। भाई-(रावण) के भय- से व्याकुल विभीषणके शरणमें आते ही आपने उठकर, उसे भरतकी नाईं हृदयसे लगा लिया ॥२॥ मैं आपका नाम ले-लेकर अपने हृदयमें एक गाँव बसाता हूँ। (उसमें बसनेके लिए) क्रम-क्रमसे भजन, विवेक, वैराग्य आदि अच्छे- अच्छे लोगोंको ला रहा हूँ। अर्थात्, मैं आपके नामके भरोसे अपने हृदयमें विवेक वैराग्य आदि सद्गुणोंको स्थान दे रहा हूँ ॥३॥ यह सुनकर क्रोधसे भरे हुए काम-क्रोधादि जबर्दस्ती जोर कर रहे हैं; और उन्हें (विवेक, वैराग्यादिको) उजाड़कर हे नाथ श्रीरामजी ! स्त्री, शत्रु, धन आदिको उस पुरमें बसाते हैं। भाव यह कि ज्यों-ज्यों मैं अपने हृदयमें सद्भावोंको भरना चाहता हूँ, त्यों-त्यों दुर्भाव जोर पकड़ते जाते हैं ॥४॥ समता (प्रेमपूर्वक मेल), सेवा, छल, दान (उनकी रुचिके अनुसार विषय) और दंड (योगादि साधन) आदि अनेक उपाय करके मैं थक गया; अर्थात् पहले मैंने काम-क्रोधादिसे समताका भाव प्रकट किया, जब उन्होंने नहीं माना, तब मैंने उनकी अधीनता दिखलायी; किन्तु जब उससे भी काम सिद्ध न हुआ तो छल किया (यानी उनकी रुचिके अनुसार वस्तु देनेके लिए कहकर उसे दिया नहीं), फिर भी कोई फल न हुआ, तब उन्हें उनकी इच्छा- के अनुसार विषय दिया, जब वे इससे भी शान्त न हुए तो योगादि साधनोंसे उन्हें निर्बल करना चाहा; किन्तु इसका भी कोई फल न हुआ। यह कलह बिना कारणके है; अतः मुझे बड़ा दुःख है। इसीसे मैंने (लाचार होकर अन्तमें)
विनय-पत्रिका २६१ प्रकट रूपमें स्वामीको पुकारा ॥५॥ (यदि आप कहें कि और देवताओंसे फरि- याद क्यों नहीं की, तो बात यह है कि और सब) देवता स्वार्थी, असमर्थ, अयोग्य और निष्ठुर हैं, उनके चित्तमें दया नहीं है। इसलिए मैं कहाँ जाऊँ ? कौन मेरी विपत्तियोंका निवारण करनेवाला है ? संसारमें (आपके सिवा) ऐसा कौन है जो संसारसे तार सकता है ? ॥६॥ यद्यपि यह तुलसीदास नीच है, फिर भी आपका है—और किसीका भी नहीं। अतः एक बार भक्तिरूपी बाँह दे दीजिये, जिससे अब यह खेड़ा (गाँव) अच्छी तरह बस जाय; अर्थात् भजन, विवेक, वैराग्य आदि हृदयमें स्थित हो जायँ ॥७॥ विशेष १—'गज'—पद ५७ के विशेषमें देखिये। २—'प्रह्लाद'—पद ९३ के विशेषमें देखिये। ३—'पांडुसुत'—पाण्डवोंके हित-साधनके लिए भगवान्ने सब-कुछ किया था। उनके दूत बनकर वह दुर्योधनके पास गये, द्रौपदीकी पुकार सुनकर उसके सहायक हुए, युद्धक्षेत्रमें अर्जुनके सारथी बने। ४—'विभीषण'—जब विभीषणने रावणसे कहा कि रामजी साक्षात् परमात्मा हैं और जानकीजी जगज्जननी हैं, अतः तुम जानकीजीको उनके पास लौटाकर क्षमा माँगो, तब रावणने विभीषणको लात मारकर अपने नगरसे बाहर निकाल दिया। उस समय विभीषण बहुत भयभीत हुआ। उसने निराश होकर अपने मनमें कहा— जिन पायनिकी पादुकनि, भरत रहे मन लाइ । ते पद आजु विलोकिहौं, इन नैननि अब जाइ ॥ यही सोचकर विभीषण भगवान् श्रीरामके चरणोंमें आ गिरा। भगवान्ने उठकर बड़े प्रेमके साथ उसे हृदयसे लगा लिया। गुसाईंजी रामचरित-मानस- में लिखते हैं :— अस कहि करत दण्डवत देखी। तुरत उठे प्रभु हर्ष बिसेखी। दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदय लगावा ॥
२६२ विनय-पत्रिका ५—"मैं तुम्हरो······राम गुसाईं"—यहाँ ग्रन्थकारने भगवान्पर बड़े ही सुन्दर ढंगसे आरोप किया है। तात्पर्य यह है कि मेरे लिए विवेक, वैराग्य आदि सद्गुणोंको हृदयमें स्थित करना ही बुरा हुआ। यदि मेरा झुकाव इस ओर न हुआ होता, तो कुटिल काम-क्रोधादि क्रुद्ध होकर न तो मुझपर जोर- जुर्म ही करते और न वे स्त्री, शत्रु तथा धन-सम्पत्तिका इतना प्रबल लोभ ही मेरे हृदयमें उत्पन्न करते। यदि आपके कारण किसी दासको काम-क्रोधादिका कोप-भाजन बनकर दुःख भोगना पड़े, तो इसमें दोष किसका है ? [ १४६ ] हौं सब विधि राम, रावरो चाहत भयो चेरो। ठौर ठौर साहबी होत है, ख्याल काल कलि केरो ॥१॥ काल-करम-इंद्रिय-विषय गाहक गन घेरो। हौं न कबूलत, बाँधि कै मोल करत करेरो ॥२॥ बन्दि-छोर तेरो नाम है, बिरुदैत बड़ेरो। मैं कह्यो, तब छल-प्रीति कै माँगे उर डेरो ॥३॥ नाम-ओट अब लगि बच्यो मलजुग जग जेरो। अब गरीब जन पोषिये पाइबो न हेरो ॥४॥ जेहि कौतुक खग स्वान को प्रभु न्याव निबेरो। तेहि कौतुक कहिये कृपालु ! 'तुलसी है मेरो' ॥५॥ शब्दार्थ—करेरो = कड़ा। विरुदैत = बानावाले। मलजुग = कलियुग। जेरो = जेरबार करना, हैरान करना। निबेरो = फैसला किया। भावार्थ—हे रामजी! मैं सब प्रकारसे आपका सेवक होना चाहता हूँ। किन्तु यहाँ कलि-कालका ऐसा ख्याल है कि जगह-जगह साहबी हो रही है ॥१॥ (वह साहबी कौन कर रहा है, सो आगे कहते हैं) काल, कर्म और इन्द्रियोंके विषयरूपी ग्राहकोंने मुझे घेर लिया है। मैं कबूल नहीं करता, पर वे बाँधकर अथवा जबर्दस्ती (मुझे खरीद लेनेके लिए) कड़ा मोल करते हैं ॥२॥ आपका नाम बन्दीछोर (बन्धनसे मुक्त कर देनेवाला) है और आपका बाना भी बड़ा
विनय-पत्रिका २६३ है। जब मैंने उनसे कहा कि (मैं तो श्रीरामजीके हाथ बिकना चाहता हूँ, तब उन ग्राहकोंने) कपट-प्रेम दिखाकर मेरे हृदयमें डेरा डालनेके लिए स्थान माँगा ॥३॥ इस संसारमें कलियुगके जेरवार करनेसे अब तक तो मैं आपके नामकी ओटमें बचता आया, पर अब इस गरीब सेवककी आप रक्षा कीजिये; नहीं तो इसे ढूँढ़नेसे पाना कठिन हो जायगा, अर्थात् कलियुग इस दासका नाम-निशान मिटा देगा ॥४॥ हे प्रभो ! आपने जिस कौतुकसे पक्षी (उल्लू) और कुत्तेका फैसला किया था, उसी कौतुकसे हे कृपालु ! कह दीजिये कि तुलसी मेरा है ॥५॥ विशेष १—'खग'—कुछ प्रतियोंमें 'बक' पाठ मिलता है। पर अधिकांशमें 'खग' पाया जाता है। बक नाम है बगुलेका। बाल्मीकीय रामायणमें उल्लूका प्रसंग आया है। उसकी कथा इस प्रकार है—उल्लू और गीध जंगलमें एक ही घरमें रहते थे। एक दिन गीधने घरपर अधिकार करनेके इरादेसे उल्लूसे कहा,— हमारा घर खाली कर दो, इसपर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं। अन्तमें दोनों रामजीके दरबारमें अपने झगड़ेका फैसला कराने गये। रामजीने उल्लूसे पूछा,— 'घर किसका है ? तू उसमें कबसे रहता है ?' उल्लूने कहा,—'जबसे वृक्षोंकी सृष्टि हुई तभीसे मैं उस घरमें रहता हूँ।' गीधने कहा,—'और जबसे मानव- सृष्टि हुई, तबसे मैं रहता हूँ।' भगवान्ने गीधसे कहा,—'वृक्षोंकी सृष्टि मनुष्योंसे पहले हुई है, इसलिए वह घर उल्लूका है, तुम घर खाली कर दो।' २—'स्वान'—एक दिन रामजीकी सभामें एक कुत्ता आया, और रोकर कहने लगा,—'महाराज ! तीर्थसिद्ध नामक ब्राह्मणने मुझ निरपराधको लाठीसे मारा है।' भगवान्ने उक्त ब्राह्मणको बुलाया और उससे लाठी मारनेका कारण पूछा। ब्राह्मणने कहा,—मैं भीख माँग रहा था, इसे रास्तेसे हटाया; जब यह न हटा, तब मैंने लाठी मार दी।' भगवान्ने ब्राह्मणको अदण्डनीय समझकर कुत्तेसे ही पूछा कि इसे क्या दण्ड दिया जाय ? अन्तमें प्रभुजीने कुत्तेकी रायसे ही उस ब्राह्मणको कालिंजरका मठाधीश बनाकर दोनोंका झगड़ा तय किया। १. पाठान्तर 'बक'।
२६४ विनय-पत्रिका [ १४७ ] कृपासिंधु ताते रहौं निसिदिन मन मारे। महाराज ! लाज आपु ही निज जाँघ उघारे ॥१॥ मिले रहैं मान्यौ चहैं कामादि सँघाती। मो बिनु रहैं न, मेरिये जारैं छल छाती ॥२॥ बसत हिये हित जानि मैं सबकी रुचि पाली। कियो कथक को दंड हौं जड़ करम कुचाली ॥३॥ देखी सुनी न आजु लौं अपनायति ऐसी। करहिं सबै सिर मेरे ही फिरि परै अनैसी ॥४॥ बड़े अलेखी लखि परैं, परिहरे न जाहीं। असमंजस में मगन हौं, लीजै गहि बाहीं ॥५॥ बारक बलि अवलोकिये, कौतुक जन जी को। अनायास मिटि जाइगो संकट तुलसी को ॥६॥ शब्दार्थ—मन मारे = उदास। सँघाती = साथी। अनैसी = अनिष्ट, निषेध। अलेखी = विचित्र, दिखाई न पड़नेवाले। भावार्थ—हे कृपासिन्धु ! हे महाराज ! इसीसे मैं रात-दिन मन मारे रहता हूँ कि जंघा उघारना अपने ही लिए लज्जाकी बात है ॥१॥ ये काम-क्रोधादि साथी मिले भी रहते हैं और मारना भी चाहते हैं। ये मेरे बिना रहते भी नहीं और छलसे मेरी ही छाती जलाते हैं। तात्पर्य, जबतक मुझमें जीवन है, तभीतक इनका अस्तित्व है; इस प्रकार आश्रित रहते हुए भी ये मेरा ही सर्वनाश करते हैं ॥२॥ यह जानकर कि ये मेरे हृदयमें बसते हैं, मैंने सबकी रुचिका भी पालन किया, अर्थात् सब विषयोंको भोग लिया, फिर भी इन जड़ और कुचाली कर्मोंने मुझे कथककी लकड़ी बना रखा है। अर्थात्, जिस प्रकार कथक अपने लड़केको नाच सिखानेके लिए लाठीमें घुँघरू बाँधकर नचाता है, उसी तरह ये मुझे नचा रहे हैं। यहाँ लकड़ीकी चंचलतासे तात्पर्य है ॥३॥ आज- तक मैंने ऐसी पराधीनता देखी या सुनी नहीं कि कर्म तो करते हैं वे सब स्वयं, और लौटकर उस कर्मका अनिष्ट पड़ता है मेरे मत्थे। अर्थात् कर्म तो करती
हैं इन्द्रियाँ, और उन कर्मोंका फल भोगना पड़ता है मुझे ॥४॥ ये बड़े विचित्र दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि इन्हें छोड़ते नहीं बनता। हे प्रभो ! मैं असमंजसमें मग्न हो रहा हूँ, मेरी बाँह पकड़ लीजिये ॥५॥ आपकी बलैया लेता हूँ, एक बार इस दासके हृदयका कौतुक तो देख लीजिये। इतनेहीसे तुलसीदास- का संकट अनायास मिट जायगा ॥६॥
[१४८] कहौं कवन मुँह लाइ कै रघुबीर गुसाईं। सकुचत समुझत अपनी सब साईँ दुहाई ॥१॥ सेवत बस, सुमिरत सखा, सरनागत सो हौं । गुनगन सीतानाथके चित करत न हौं हौं ॥२॥ कृपासिंधु बंधु दीनके आरत-हितकारी। प्रनत-पाल बिरुदावली सुनि जानि विसारी ॥३॥ सेइ न धेइ न सुमिरि कै पद-प्रीति सुधारी। पाइ सुसाहिब रामसों, भरि पेट विगारी ॥४॥ नाथ गरीब-निवाज हैं, मैं गही न गरीबी। तुलसी प्रभु निज ओर तें बनि परै सो कीबी ॥५॥
शब्दार्थ- दुहाई = सौगन्ध । हौं = मैं। हौं = हूँ। धेइ = ध्येय । भरिपेट = पेटभर, अधिकसे अधिक । कीबी = कीजियेगा, कीजिये ।
भावार्थ- हे रघुवीर ! हे स्वामी ! मैं कौनसा मुँह लेकर आपसे कुछ कहूँ ? दुहाई स्वामीकी ! मैं अपनी करनी समझते ही सकुच जाता हूँ ॥१॥ आप सेवा करनेसे वशमें हो जाते हैं, स्मरण करनेसे मित्र बन जाते हैं और शरणागत होनेसे सम्मुख प्रकट हो जाते हैं। हे सीतानाथ ! आपके इन गुणोंपर ध्यान नहीं दे रहा हूँ ॥२॥ हे कृपासागर ! आप दीनोंके बन्धु हैं, दुखियोंका हित करनेवाले हैं और शरणागतोंका पालन करनेवाले हैं, आपकी इस विरुदावलीको सुन और जानकर भी मैंने आपको भुला दिया है ॥३॥ सेवा द्वारा, ध्यान द्वारा अथवा स्मरण द्वारा मैंने आपके चरणोंमें प्रेम नहीं किया। हे रामजी ! आपके समान अच्छा स्वामी पाकर भी मैंने खूब बिगाड़ डाला ॥४॥ हे नाथ ! आप तो
२६६ विनय-पत्रिका गरीबोंपर कृपा करनेवाले हैं, पर मैंने गरीबी अख्तियार नहीं की। हे प्रभो ! इस तुलसीके लिए आप अपनी ओरसे जो कुछ बन पड़े सो कीजिये ॥५॥ विशेष १—'भरि पेट बिगारी'—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि मैंने पेट भरनेमें ही सब बिगाड़ दिया अर्थात्, जन्मभर मुझे पेटके ही लाले पड़े रहे, कुछ भी करते-धरते न बना। [ १४९ ] कहाँ जाउँ, कासों कहौं, और ठौर न मेरे। जनम गँवायो तेरे ही द्वार किंकर तेरे ॥१॥ मैं तो बिगारी नाथ सों आरति के लीन्हें। तोहि कृपानिधि क्यों बनै मेरी-सी कीन्हें ॥२॥ दिन-दुरदिन दिन-दुरदसा, दिन-दुख दिन दूषन । जब लौं तू न बिलोकि है रघुबंस-विभूषन ॥३॥ दई पीठ बिनु डीठ मैं तुम बिस्व-विलोचन । तो सों तुही न दूसरो नत सोच-विमोचन ॥४॥ पराधीन देव दीन हौं, स्वाधीन गुसाईं। बोलनिहारे सों करै बलि बिनय कि झाँईं ॥५॥ आपु देखि मोहिं देखिये जन मानिय साँचो । बड़ी ओट रामनामकी जेहि लई सो बाँचो ॥६॥ रहनि रीति राम रावरी नित हिय हुलसी है। ज्यों भावै त्यों करु कृपा तेरो तुलसी है ॥७॥ शब्दार्थ—किंकर = दास । आरतिके लीन्हें = क्लेश-ग्रस्त होनेके कारण । डीठ = दृष्टि । नत = झुकनेपर, प्रणत । झाँईं = छाया । भावार्थ—कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ ? मेरे लिए तो और कहीं ठौर नहीं ! मैं तो आपका ही दास हूँ और आपहीके द्वारपर मैंने सारी जिन्दगी बितायी है ॥१॥ हे नाथ ! आपकी ओरसे मैंने तो बिगाड़ा है क्लेश-ग्रस्त होनेके कारण;
किन्तु हे कृपानिधि ! यदि आप भी मेरे जैसा ही करेंगे तो कैसे काम चलेगा ? ॥२॥ हे रघुवंश-विभूषण ! जबतक आप न देखेंगे (कृपा न करेंगे), तबतक नित्य-प्रति बुरे दिन रहेंगे, नित्य-प्रति दुर्दशा होती रहेगी , रोज-रोज दुःख होता रहेगा और नित्य दोष लगते रहेंगे ॥३॥ मैंने जो पीठ दी है (आपसे मुँह मोड़ा है), वह इसलिए कि मैं दृष्टिहीन (अन्धा) हूँ; किन्तु आप विश्व-विलोचन अर्थात् संसारके द्रष्टा हैं। हे भक्तोंके सोचको हरनेवाले, आपके समान आप ही हैं, दूसरा कोई नहीं ॥४॥ हे देव ! हे स्वामी ! मैं पराधीन हूँ, दीन हूँ और आप स्वाधीन हैं। मैं आपकी बलि जाऊँ। (आप ही कहिये कि) क्या छाया (कभी) बोलनेवालेसे विनय करती है (कर सकती है) ? ॥५॥ इसलिए पहिले आप अपनी ओर देखकर पीछे मेरी ओर देखिये, बादमें इस दासको सच्चा मानिये। जो राम-नामकी बड़ी आड़में हो गया अर्थात् जिसने राम-नामका प्रधान सहारा ले लिया, वह बच गया ॥६॥ हे रामजी ! आपकी रहन और रीति मेरे हृदयमें नित्य-प्रति उमड़ती रहती है; अतः जैसे रुचे वैसे कृपा कीजिये—यह तुलसी आपका है ॥७॥
विशेष
१—"बोलनिहारे......झाईं"—इसमें बड़ा ही गूढ़ अभिप्राय है। अर्थात् जैसे जड़ परछाईं कुछ नहीं कर सकती, वैसे ही परमात्माका प्रतिबिम्ब यह जीव भी स्वयं कुछ नहीं कर सकता। क्योंकि प्रतिबिम्ब तो बिम्बके आधारपर आचरण करता है। जैसा आचरण बिम्ब करता है, वैसा ही प्रतिबिम्बमें प्रतीत होता है। जैसे, जब हम खड़े होते हैं, तब हमारी छाया भी खड़ी हो जाती है; जब हम बैठते हैं तब परछाईं भी बैठ जाती है। हम जो भी चेष्टा करते हैं, सब छायामें प्रतीत होती है। ठीक वही दशा जीवकी है। इसी भावको लेकर गोस्वामीजीने कहा है कि आप जो कुछ करते हैं, वही इस जीवमें प्रतीत होता है। ऐसी दशामें यदि आप ईश्वर होकर इससे सेवा चाहें या इसकी करनी देखें, तो क्या उचित होगा ? क्योंकि यह तो आपके आश्रित है। इसीसे आगे एक चरणमें गोस्वामीजी कहते हैं कि हे नाथ ! पहले आप अपनी ओर देखकर पीछे मेरी ओर देखिये। धन्य गोस्वामीजी !
२६८ विनय-पत्रिका [ १५० ] रामभद्र ! मोहिं आपनो सोच है अरु नाहीं। जीव सकल संतापके भाजन जग माहीं ॥१॥ नातो बड़े समर्थ सों इक ओर किधौं हूँ। तो को मोसे अति घने मोको एकै तूँ ॥२॥ बड़ी गलानि हिय हानि है सर्बग्य गुसाँई । क्रूर कुसेवक कहत हौं सेवककी नाईं ॥३॥ भलो पोच राम को कहैं मोहिं सब नरनारी। बिगरे सेवक खान ज्यों साहिब-सिर गारी ॥४॥ असमंजस मनको मिटै सो उपाय न सूझै। दीनबन्धु ! कीजै सोई बनि परै जो बूझै ॥५॥ विरुदावली बिलोकिये तिन्हमें कोउ हौं हौं। तुलसी प्रभुको परिहन्यो सरनागत सो हौं ॥६॥ शब्दार्थ—रामभद्र = कल्याण । भाजन = पात्र । क्रूर = दुष्ट । पोच = बुरा, नीच । भावार्थ—हे कल्याण-स्वरूप रामजी ! मुझे अपना सोच है भी और नहीं भी है। क्योंकि संसारमें सब जीव दुःख-भाजन हैं; अर्थात् सोच तो इसलिए है कि हाय ! मेरा अभीतक उद्धार नहीं हुआ और निश्चिन्त इसलिए हूँ कि जीव- मात्रकी तो यही दशा है, फिर सोच किस बातका ? ॥१॥ क्या बड़े समर्थसे केवल एक ही (मेरी ही) ओरसे नाता है ? इसलिए कि आपके लिए मुझ-से बहुत हैं और मेरे लिए आप केवल एक ही हैं ? ॥२॥ किन्तु हे स्वामी ! आप तो सर्वज्ञ हैं—घट-घटकी जानते हैं, मुझे (इस बातकी) बड़ी ग्लानि है और उसे मैं अपने हृदयमें हानि भी समझता हूँ कि दुष्ट और बुरा सेवक होनेपर भी मैं सेवककी तरह आपसे कह रहा हूँ ॥३॥ मैं भला हूँ या बुरा, पर सब स्त्री-पुरुष मुझे रामजीका ही कहते हैं। कुत्तेकी तरह सेवकका भी काम बिगड़नेसे स्वामीके ही सिर गालियाँ पड़ती हैं (बस यही ग्लानि है) ॥४॥ मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं सूझ रहा है जिससे मेरे मनका असमंजस मिट जाय। अतः हे दीनबन्धु ! जो जान पड़े और हो सके, वही (मेरे लिए) कीजिये ॥५॥ आप अपनी बिरदावली-
विनय-पत्रिका २६१ की ओर देखिये, उसीमें कोई मैं भी होऊँगा। अर्थात् जिन अधमोंको आप तार चुके हैं, उनमें किसी-न-किसी अधमीकीसी ही अधमता मेरी भी होगी। हे प्रभो ! आपका त्यागा हुआ यह तुलसी आपकी शरणमें जाकर सामने ही रहेगा— अन्यत्र कहीं न जायगा ॥६॥ विशेष यह पद अत्यन्त भावपूर्ण और सच्चे हृदयोद्गारका सुन्दर द्योतक है। इसमें गुसाईंजीकी आन्तरिक भावना झलक रही है। १—'बड़ी·········नाईं'—इसका यह भी अर्थ हो सकता है कि 'मेरे हृदयमें ग्लानि है कि (मेरे कारण) सर्वज्ञ स्वामीकी हानि हो रही है। क्योंकि कुत्तेकी तरह सेवकका भी काम बिगड़नेपर स्वामीके ही सिर गालियाँ पड़ती हैं। किन्तु असली अर्थ वही है, जो भावार्थमें लिखा गया है। इसमें 'सर्वज्ञ' शब्द बड़ा ही सार्थक है। 'बड़ी ग्लानि है, हृदयमें हानि मानता हूँ' हे नाथ इसे आप समझ रहे हैं कि मैं सच कह रहा हूँ या नहीं। क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं। [ १५१ ] जौ पै चेराई राम की करतो न लजातो। तौ तू दाम कुदाम ज्यों कर-कर न बिकातो ॥१॥ जपत जीह रघुनाथ को नाम नहीं अलसातो। बाजीगर के सूम ज्यों खल खेह न खातो ॥२॥ जौ तू मन ! मेरे कहे राम-नाम कमातो। सीतापति सनमुख सुखी सब ठाँव समातो ॥३॥ राम सोहाते तोहिं जौ तू सबहिं सोहातो। काल करम कुल कारनी कोऊ न कोहातो ॥४॥ राम-नाम अनुराग ही जिय जो रतिआतो। स्वारथ-परमारथ-पथी तोहिं सब पतिआतो ॥५॥ सेइ साधु सुनि समुझि कै पर-पीर पिरातो। जनम कोटि को काँदलो हृद-हृदय थिरातो ॥६॥
६. दैन्य-निवेदन, आत्म-बोध व कलियुग उपद्रव
२७० विनय-पत्रिका भव-मग अगम अनंत है, बिनु श्रमहिं सिरातो । महिमा उलटे नाम की मुनि कियो किरातो ॥७॥ अमर-अगम तनु पाइ सो जड़ जाय न जातो । होतो मंगल-मूल तू, अनुकूल बिधातो ॥८॥ जो मन, प्रीति-प्रतीति सों राम-नामहिं रातो । तुलसी राम प्रसाद सों तिहुँ ताप न तातो ॥९॥ शब्दार्थ—चेराई = सेवा। सूम = कंजूस, कपड़ेका स्वरूप बनाकर बाजीगर जो तमाशा दिखाते हैं, उसे सूम कहते हैं। खेह = धूल। कारनी = कारण, प्रेरक। कोहातो = क्रोध करते, नाराज होते। रतिआतो = प्रीति करता, लगन लगाता। पतिआतो = विश्वास करते। पिरातो = दर्द होता। काँदलो = मलिनता। हृद = सरोवर। जाय = व्यर्थ। भावार्थ—(रे जीव !) यदि तू श्रीरामजीकी सेवा करनेमें न लज्जित होता, तो तू दाम (शुद्ध सुवर्ण) होकर कुदाम (ताँबा-पीतल) की तरह इस हाथसे उस हाथ न बिकता। अर्थात् तू परमात्माका अंश होकर अनेक योनियोंमें भटकता न फिरता ॥१॥ यदि तू जीभसे रघुनाथजीका नाम जपनेमें आलस्य न करता, तो रे खल ! तू बाजीगरके सूमकी तरह धूल न फाँकता ॥२॥ रे मन ! यदि तू राम-नामकी कमाई करता, तो सीतानाथके सम्मुख या प्रसन्न हो जानेसे तू सुखी हो जाता और सब जगह (लोक-परलोकमें) प्रवेश करता, अर्थात् लोक-परलोक दोनों ही बन जाते ॥३॥ यदि रामजी तुझे अच्छे लगते तो तू भी सबको भाता। फिर तो काल, कर्म आदि जितने कारणी हैं, कोई भी तुझपर क्रोध न करते ॥४॥ यदि तू हृदयसे राम-नामके अनुरागमें लगन लगाता, तो स्वार्थ और परमार्थ दोनोंके पथिक तुझपर विश्वास करते ॥५॥ यदि तू साधुकी सेवा करता, दूसरोंकी पीड़ा सुन और समझकर तुझे दर्द होता, तो करोड़ों जन्मकी मलिनता तेरे हृदय-सरोवरमें नीचे बैठ जाती ॥६॥ (उस दशामें) संसारका जो मार्ग अगम और अनन्त है, उसे तू बिना परिश्रमके ही पार कर जाता। (देख न) उलटे नामकी महिमाने किरात (बाल्मीकि) को मुनि बना दिया था ॥७॥ रे जड़ ! (फिर तो) तेरा देवताओंके लिए दुर्लभ शरीर पाना व्यर्थ न जाता, तू मंगल-मूल हो जाता, विधाता तेरे अनुकूल हो जाते ॥८॥ रे मन ! यदि तू प्रेम और विश्वाससे राम-
विनय-पत्रिका २७१ नामसे प्रेम करता, तो यह तुलसी श्रीरामजीके प्रसादसे तीनों तापोंसे तप्त न होता—जलता न ॥९॥ [ १५२ ] राम भलाई अपनी भल कियो न काको। जुगुजुग जानकिनाथ को जग जागत साको ॥१॥ ब्रह्मादिक बिनती करी कहि दुख बसुधाको। रवि-कुल-कैरव - चंद भो आनंद - सुधाको ॥२॥ कौसिक गरत तुषार ज्यों तकि तेज तियाको। प्रभु अनहित हित को दियो फल कोप कृपाको ॥३॥ हन्यो पाप आप जाइकै संताप सिलाको। सोच-मगन काढ्यो सही साहिब मिथिलाको ॥४॥ रोष-रासि भृगुपति धनी अहमिति ममता को। चितवत भाजन करि लियो उपसम समता को ॥५॥ मुदित मानि आयसु चले बन मातु-पिताको। धरम-धुरंधर धीर धुर गुन-सील-जिता को ? ॥६॥ गुह गरीब गतग्याति हू जेहि जिउ न भखाको ? । पायो पावन प्रेम तें सनमान सखा को ॥७॥ सदगति सबरी गीध की सादर करता को ? । सोच-सींव सुग्रीव के संकट हरता को ? ॥८॥ राखि बिभीषन को सकै अस काल-गहा को ? । आज बिराजत राज है दसकंठ जहाँ को ॥९॥ बालिस बासी अवध को बूझिये न खाको। सो पाँवर पहुँचे तहाँ जहँ मुनि-मन थाको ॥१०॥ गति न लहै राम-नाम सों विधि सों सिरजा को ? । सुमिरत कहत प्रचारि कै बल्लभ गिरिजा को ॥११॥ अकनि अजामिल की कथा सानंद न भा को ? । नाम लेत कलिकाल हू हरि पुरहिं न गा को ? ॥१२॥
२७२ विनय-पत्रिका राम-नाम-महिमा करै काम-भूरुह-आको। साखी वेद-पुरान हैं तुलसी-तन ताको ॥१३॥ शब्दार्थ—साको = यश। भो = हुए। कौसिक = विश्वामित्र। गरत = गलते थे। अन हित = यह शब्द ताड़काके लिए आया है। उपसम = शान्ति। गतग्याति = नीच जाति बालिस = मूढ़। खाको = खाक। थाको = थक जाता है। सिरजा = सृजा, बनाया। अकनि = अकनकर, सुनकर। भा = हुआ। गा = गया। भूरुह = वृक्ष। आको = आक, मन्दार। भावार्थ—रामजीने अपनी भलमनसाहतसे किसका भला नहीं किया ? संसारमें युग-युगसे जानकीनाथका यश जाग रहा है अर्थात् प्रसिद्ध है ॥१॥ ब्रह्मा आदिने पृथिवीका दुःख कहकर विनती की, और सूर्यवंशरूपी कुमुदिनीको प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्ररूप एवं अमृततुल्य आनन्दसे पूर्ण भगवान् रामजीने अवतार लिया ॥२॥ विश्वामित्र, ताड़काका तेज देखकर ओलेकी तरह गले जाते थे। प्रभुने अनहित (ताड़का) को हितका, और कोपका कृपा (के रूपमें) फल दिया। अर्थात्, ताड़काको मारा तो कुपित होकर शत्रुको तरह, पर उसे मुक्त कर दिया मित्रकी तरह ॥३॥ आपने अपनेसे जाकर शिला अहल्याका पाप-सन्ताप हर लिया और मिथिलाधिपति जनकजीको शोक-सागरमें डूबनेसे उबार लिया। अर्थात् धनुष तोड़कर उनकी चिन्ता दूर कर दी ॥४॥ परशुरामजी क्रोधके समूह और अहंता-ममताके धनी थे; उन्हें भी आपने अपनी दृष्टि डालते ही शान्ति और समताका पात्र बना लिया। अर्थात् वह क्रोध-रहित होकर शान्त हो गये और अहंकार एवं ममत्वको छोड़कर समद्रष्टा हो गये ॥५॥ आप माता- पिताकी आज्ञा मानकर प्रसन्नताके साथ वन चले गये। ऐसा धर्म-धुरन्धर, धीरज धारण करनेवाला तथा गुण-शीलको जीतनेवाला दूसरा कौन है ? ॥६॥ नीच जातिके गरीब गुहनिषादने भी, जो सब प्रकारके जीवोंको भक्षण करनेवाला था—पवित्र प्रेम और सखाके समान सम्मान पाया था ॥७॥ भला शबरी और गीध (जटायु) को आदरके साथ सद्गति कौन देता ? अत्यन्त शोकातुर सुग्रीवका संकट कौन हरण करता ? ॥८॥ कालका ग्रसा हुआ ऐसा कौन था जो विभीषण- को (अपनी शरणमें) रख सकता ? अर्थात्, किसके सिरपर काल सवार था जो रावणसे बैर मोल लेकर विभीषणको शरण देता ? किन्तु (रामजीकी कृपासे) आज भी वह राज्य (लंका) विराजमान है—जहाँका राजा रावण था ॥९॥ अयोध्या-
विनय-पत्रिका २७३ निवासी मूर्ख धोबी (जगज्जननी जानकीकी निन्दा करनेवाला), जिसमें खाक- पत्थर भी समझ न थी, अथवा जो खाककी तरह तुच्छ समझा जाता था, वह नीच भी उस स्थानपर पहुँच गया था जहाँ पहुँचनेमें मुनियोंका मन भी थक जाता है ॥१०॥ ब्रह्माने ऐसा किसे बनाया है, जो रामनामके प्रभावसे मुक्ति न पा सके। (रामनामका) स्मरण पार्वती-वल्लभ भगवान् शंकर करते हैं और दूसरोंसे कह-कहकर उसका प्रचार करते हैं ॥११॥ अजामिलकी कथा सुनकर कौन आनन्दित नहीं हुआ ? नाम लेते ही इस कलिकालमें भी ऐसा कौन है जो विष्णुलोकमें नहीं गया ? ॥१२॥ रामनामकी ऐसी महिमा है कि वह आकके पेड़को कल्पवृक्ष बना सकती है। इसके लिए वेद और पुराण साक्षी हैं; और फिर तुलसीके शरीरको देखो न ! (वह क्यासे क्या हो गया) ॥१३॥
[ १५३ ] मेरे रावरियै गति है रघुपति बलि जाउँ । निलज नीच निरधन निरगुन कहँ, जग दूसरो न ठाकुर ठाउँ ॥१॥ हैं घर घर बहु भरे सुसाहिब, सूझत सबनि आपनो दाउँ । बानर-बंधु विभीषन-हितु बिनु, कोसलपाल कहूँ न समाउँ ॥२॥ प्रनतारति-भंजन जन-रंजन, सरनागत पवि-पंजर नाउँ । कीजै दास दासतुलसी अब, कृपासिंधु बिनु मोल बिकाउँ ॥३॥
शब्दार्थ—रावरियै = आपकीही । ठाउँ = जगह । प्रनतारति (प्रणत + आरति) = भक्तोंका दुःख । पवि = वज्र ।
भावार्थ—हे रघुनाथजी ! बलिहारी, मुझे तो केवल आपकीही शरण है । मुझ निर्लज्ज, नीच, निर्धन और गुणहीनके लिए संसारमें न तो दूसरा कोई स्वामी है और न कोई स्थान ही है ॥१॥ यों तो घर-घरमें बहुत-से अच्छे-अच्छे स्वामी भरे पड़े हैं, किन्तु उन सबको अपना दाँव सूझता है । मैं तो बन्दरोंके बन्धु और विभीषणके हितू कोशलपाल रामजीको छोड़कर कहीं भी (किसी भी घरमें) नहीं समा सकता ॥२॥ आपका नाम भक्तोंके दुःखोंका नाशक, भक्तोंको सुख देने- वाला तथा शरणागतोंके लिए वज्रका बना हुआ पिंजरा है । हे कृपासिन्धु ! अब १८
२७४ विनय-पत्रिका आप तुलसीदासको अपना दास बना लीजिये—मैं बिना मोल (आपके हाथ) बिकना चाहता हूँ ! तात्पर्य यह है कि मैं निष्काम सेवक बनना चाहता हूँ॥३॥ [ १५४ ] देव ! दूसरो कौन दीन को दयालु । सील-निधान सुजान-सिरोमनि, सरनागत-प्रिय प्रनत-पालु ॥१॥ को समरथ सर्वग्य सकल प्रभु, सिव-सनेह-मानस-मरालु । को साहिब किये मीत प्रीति बस खग निसिचर कपि भील भालु॥२ नाथ हाथ माया-प्रपंच सब, जीव-दोष-गुन-करम-कालु । तुलसिदास भलो पोच रावरो, नेकु निरखि कीजिय निहालु॥३॥ भावार्थ—हे देव ! (आपके सिवा) दीनोंपर दया करनेवाला दूसरा कौन है ? आप शील-निधान, ज्ञानियोंमें शिरोमणि, शरणागतोंके परम प्रिय और भक्तों- के पालनेवाले हैं ॥१॥ आपके समान सामर्थ्यवान, सर्वज्ञ और सबका स्वामी कौन है ? आप शिवजीके स्नेहरूपी मानसरोवरमें (विहार करनेवाले) हंस हैं । (आपके सिवा) किस स्वामीने प्रेमवश पक्षी (जटायु), निशाचर (विभीषण), बन्दर (सुग्रीव), भील (निषाद) और भालुओं (जामवन्त आदि) को अपना मित्र बनाया है ? ॥२॥ हे नाथ ! मायाके प्रपंच, जीवोंके दोष, गुण कर्म और काल सब आपके हाथ हैं । यह तुलसीदास भला हो या बुरा, आपका ही है । जरा इसकी ओर देखकर इसे निहाल कर दीजिये ॥३॥ विशेष १—‘खग’—जटायु; २१५वें पदके विशेषमें देखिये । राग सारङ्ग [ १५५ ] बिस्वास एक राम-नाम को । मानत नहिं परतीति अनत ऐसोइ सुभाव मन वाम को ॥१॥ पढ़िबो परचो न छठी छ मत रिगु जजुर अथर्बन सामको । व्रत तीरथ तप सुनि सहमत पचि मरै करै तन छाम को ? ॥२॥
करम-जाल कलिकाल कठिन आधीन सुसाधित दाम को । ग्यान बिराग जोग जप तप भय लोभ मोह कोह काम को ॥३॥ सब दिन सब लायक भव गायक रघुनायक गुन-ग्राम को । बैठे नाम-कामतरु-तर डर कौन घोर घन घाम को ॥४॥ को जानै को जैहै जमपुर को सुरपुर पर-धाम को । तुलसिहिं बहुत भलो लागत जग जीवन राम-गुलाम को ॥५॥ शब्दार्थ—बाम = टेढ़े । पर्यो न छठी = भाग्यमें नहीं लिखा । छ रुत = छ शास्त्र । सहमत = सहम जाता है, सिकुड़ जाता है । छाम = दुर्बल । परधाम = बैकुण्ठ, ब्रह्मलोक । भावार्थ—मुझे एक राम-नामका ही विश्वास है। मेरे कुटिल मनका ऐसा ही स्वभाव है; वह (राम नामको छोड़कर) अन्यत्र विश्वास ही नहीं करता ॥१॥ छ शास्त्रों (न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त) का तथा ऋक्, यजु, साम और अथर्वण वेदोंका पढ़ना मेरे भाग्यमें नहीं लिखा है। व्रत, तीर्थ और तप आदिका नाम सुनकर मन सिकुड़ जाता है कि (इनमें) कौन पच-पचकर मरे और शरीरको क्षीण करे ॥२॥ कलिकालमें कर्म-जाल बड़ा ही कठिन है और उसे ठीक-ठीक साध लेना पैसेके अधीन है। रहे ज्ञान, वैराग्य, योग, जप और तप आदि, सो इनके करनेमें काम, क्रोध, लोभ, मोह आदिका भय है ॥३॥ संसारमें श्रीरघुनाथजीके गुणोंको गानेवाले सदा सब प्रकारसे योग्य हैं। क्योंकि राम-नाम-रूपी कल्पवृक्षके नीचे बैठे हुए लोगोंको कड़ी धूप (सांसारिक त्रितापों) का क्या डर है ? ॥४॥ कौन जानता है कि कौन यमपुरी (नरक) में जायगा, कौन स्वर्गमें जायगा और कौन ब्रह्मलोकमें जायगा ? तुलसीदासको तो इस संसारमें श्रीरामजीके गुलामका जीवन ही बहुत अच्छा लगता है ॥५॥ [ १५६ ] कलि नाम कामतरु राम को । दलनिहार दारिद दुकाल दुख, दोष घोर घन घाम को ॥१॥ नाम लेत दाहिनो होत मन, बाम विधाता वामको । कहत मुनीस महेस महातम, उलटे सीधे नाम को ॥२॥
२७६ विनय-पत्रिका भलो लोक-परलोक तासु जाके बल ललित-ललामको। तुलसी जग जानियत नाम ते सोच न कूच मुकामको ॥३॥ शब्दार्थ—कामतरु = कल्पवृक्ष । दुकाल = अकाल, दुर्भिक्ष । बाम = प्रतिकूल । दाहिनो = अनुकूल, प्रसन्न । ललित = सुन्दर । ललाम = सुन्दर, रम्य । भावार्थ—कलियुगमें रामनाम कल्पवृक्ष है। वह दरिद्रता, दुर्भिक्ष, दुःख और दोषको मिटानेवाला तथा सांसारिक त्रितापरूप घामके लिए घोर मेघरूप है ॥१॥ नाम लेते ही विधाताका प्रतिकूल मन भी अधमोंपर या भाग्यहीनोंपर अनुकूल हो जाता है। बड़े-बड़े मुनि और शिवजी भी उलटे-सीधे (किसी प्रकार भी अपनेसे) नामका (ऐसा ही) माहात्म्य कहते हैं, अर्थात् राम-नामरूपी लड्डू टेढ़ा-सीधा हर तरहका सर्वोत्तम है ॥२॥ जिसे ललित-ललाम (सुन्दर और रम्य) राम-नामका भरोसा है उसके लिए लोक-परलोक दोनों ही अच्छे हैं। हे तुलसी- दास ! नामके प्रभावसे इस संसारसे कूच करने अथवा इसमें रहनेका सोच नहीं होता। भाव यह है कि नामके प्रभावसे मनुष्यको जन्म-मरणकी चिन्ता ही नहीं रह जाती ॥३॥ विशेष १—'घोर घन घामको'—इसका अर्थ प्रखर धूप-सदृश त्रिताप भी हो सकता है। २—'बाम'—शब्दका अर्थ लिखा है 'अधमः' । इति सिद्धान्तकौमुद्या- मुणादिवृत्तिः । इस चरणका अर्थ इस प्रकार भी किया जा सकता है:—'प्रति- कूल विधाताका प्रतिकूल मन अनुकूल हो जाता है।' ३—'कहत मुनीस······नामको'—इसका यह अर्थ भी होता है कि 'मुनीश (वाल्मीकि) ने उलटे नामका और शिवजीने सीधे नामका माहात्म्य कहा है।' ४—'ललित-ललाम'—'ललित'का अर्थ है 'सुन्दर' और 'ललाम' का अर्थ मेदिनी कोषमें लिखा है:—'चिह्नम्, ध्वजः, शृंगम्, प्रधानम्, भूषा, रम्यम्, वालधिः, पुण्ड्रम्, तुरंगः, प्रभावः।' यहाँपर 'प्रधान' या 'रम्य' अर्थ ही अभिप्रेत है। वियोगी हरिजीने 'ललित-ललाम' का अर्थ किया है, "यह दोनों ही शब्द सुन्दरके बोधक हैं; सुन्दरसे भी सुन्दर।"
विनय-पत्रिका २९७ [ १५७ ] सेइये सुसाहिब राम सो । सुखद सुसील सुजान सूर सुचि, सुन्दर कोटिक काम सो ॥१॥ सारद सेस साधु महिमा कहैं, गुनगन-गायक साम सो । सुमिरि सप्रेम नाम जासों रति चाहत चन्द्र-ललाम सो ॥२॥ गमन विदेस न लेस कलेस को, सकुचत सकृत प्रनाम सो । साखी ताको विदित विभीषन, बैठो है अबिचल धाम सो ॥३॥ टहल सहल जन महल-महल, जागत चारो जुग जाम सो । देखत दोष न खीझत, रीझत सुनि सेवक गुन-ग्राम सो ॥४॥ जाके भजे तिलोक-तिलक भये, त्रिजग जोनि तनु ताम सो । तुलसी ऐसे प्रभुहि भजै जो न ताहि विधाता बाम सो ॥५॥ शब्दार्थ—साम = सामवेद । चन्द्र-ललाम = जिनके चन्द्रमा भूषण हैं, अर्थात् शिवजी । टहल = सेवा । सहल = आसान । त्रिजग = तिर्यक् योनि, पशु-पक्षी । भावार्थ—राम-सरीखे सुन्दर स्वामीकी सेवा करनी चाहिये । वह सुख देने- वाले, सुशील, चतुर, वीर, पवित्र और करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक सुन्दर हैं ॥१॥ सरस्वती, शेष और सन्तजन उनकी महिमा कहते हैं, और उनके गुणों- को गानेवाले सामवेद-सरीखे हैं । बड़े प्रेमके साथ नामका स्मरण करते हुए शिवजी-सरीखे (देवाधिदेव) जिनसे प्रेम करना चाहते हैं ॥२॥ जिन्हें विदेश- गमन (वन-यात्रा) करते समय रंचमात्र भी क्लेश नहीं हुआ । जो एक बार प्रणाम करनेसे ही सकुच जाते हैं और इसका साक्षी विभीषण प्रसिद्ध है जो कि आज भी लंकामें अविचल भावसे बैठा हुआ है ॥३॥ जिनकी टहल बहुत आसान है, जो भक्तोंके घट-घटमें चारों युगमें चारों पहर जागते रहते हैं; जो भक्तोंके दोष देखकर भी नहीं खीझते, किन्तु सेवकोंकी गुणावली सुनकर ही (देखनेको कौन कहे) रीझ जाते हैं ॥४॥ जिसे भजकर तिर्यक् योनिके पशु-पक्षी तथा तामसी शरीरवाले (राक्षस) तीनों लोकोंके तिलक हो गये, तुलसीदास कहते हैं कि ऐसे प्रभुको जो लोग नहीं भजते, विधाता उनके प्रतिकूल हैं, अर्थात् उनका दुर्भाग्य है ॥५॥