विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९६ विनय-पत्रिका भावार्थ—हे नाथ ! मुझे यम-यातनामें ही डाल दीजिये । क्योंकि हे रामजी ! मैं ऐसा शठ हूँ कि आप जैसे पवित्र और सुहृद स्वामीकी ओर मैंने पीठ कर दी है (आपसे विमुख हो गया हूँ) ॥१॥ गर्भवासके समय दस महीने- तक पालकर आपने पिता-माताके रूपमें मेरा हित किया । इस मूर्खको आपने विवेक दिया । इस दुष्टको आपने सुशीलता दी ! इस अपराधीको आपने आदर दिया ! ॥२॥ किन्तु मैं अन्तर्यामी प्रभुसे भी कपट करता हूँ, व्यापक पापोंको छिपाता हूँ। किन्तु हे रघुनाथजी ! आपने ऐसे दुर्बुद्धि और बुरे सेवकपर भी अपना मन वाम नहीं किया ॥३॥ पेट तो भरता हूँ आपका दास कहाकर; किन्तु मैंने अपने हृदयको विषयोंके हाथ बेच दिया है। हे कृपालु ! भला मुझ-सा वंचक कौन है जिसपर आपने छल छोड़कर (या मेरे छल-भावपर ध्यान न देकर) छोह किया है ? ॥४॥ आपके पल-पलके किये हुए उपकारोंको अच्छी तरह जान- बूझकर तथा सुनकर भी, वज्रसे भी अधिक कठोर मेरे चित्तमें कभी श्रीसीतानाथ- का प्रेम न धँसा ॥५॥ हे स्वामी ! मैंने अपनी बुद्धिरूपा तराजूपर एक ओर आपकी सब भक्त-वत्सलता रखी और दूसरी ओर थोड़ा-सा अपना स्वामि-द्रोह रखकर देखा, तो मेरी ओरका पलड़ा भारी रहा अर्थात् मेरा स्वामि-द्रोह अधिक हुआ । ॥६॥ इतनेपर भी हे नाथ ! आप मेरा हित करते आये हैं, कर रहे हैं और करेंगे । तुलसी अपनी ओरसे जानता है कि इस एहसानको स्वामी ही भरेंगे । अर्थात् रामजी ही पूरा करेंगे ॥७॥ [ १७२ ] कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो । श्री रघुनाथ-कृपालु-कृपा तें संत-सुभाव गहौंगो ॥१॥ जथा लाभ सन्तोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो । पर-हित-निरत निरंतर, मन क्रम बचन नेम निवहाँगो ॥२॥ परुष बचन अति दुसह श्रवन सुनि तेहि पावक न दहौंगो । बिगत मान, सम सीतल मन, पर-गुन नहिं दोष कहौंगो ॥३॥ परिहरि देह-जनित चिंता, दुख-सुख समबुद्धि सहौंगो । तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि, अबिचल हरि-भगति लहौंगो ।४। शब्दार्थ—निरत = संलग्न । परुष = कठोर । दहौंगो = जलूँगा । लहौंगो = प्राप्त करूँगा ।