भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 308

विनय-पत्रिका २९७ भावार्थ—क्या कभी मैं भी इस रहन या रीतिसे रहूँगा ? क्या कभी कृपालु श्रीरघुनाथजीकी कृपासे मैं भी सन्त-स्वभाव ग्रहण करूँगा ? ॥१॥ जो कुछ प्राप्त हो जायगा, उसीसे सदा सन्तोष करूँगा, किसीसे कुछ न माँगूँगा ? निरन्तर दूसरोंकी भलाईमें लगा रहूँगा और मन, वचन, कर्मसे नेम, निबाहूँगा ? ॥२॥ अत्यन्त दुःसह और कठोर वचन अपने कानोंसे सुनकर उसकी आगमें न जलूँगा ? मानकी इच्छा न करूँगा, मनको एक रस और शीतल रखूँगा तथा दूसरोंके गुण-दोष या स्तुति-निन्दाकी चर्चा न करूँगा ? ॥३॥ देह-जनित चिन्ताओंको छोड़कर सुख और दुःखको समबुद्धिसे सहूँगा ? हे प्रभो ! क्या यह तुलसीदास इस पथपर रहकर अविचल (अटल) भगवद्भक्ति प्राप्त करेगा ? ॥४॥ विशेष १ इस पदमें कविकी कल्पना नहीं बल्कि मनकी आन्तरिक कामना है । जरा 'रसखान' कविका भी ऐसा ही विचरण देखिये :- मानुष हौं तो वही रसखान बसौं ब्रज गोकुल गाँवके ग्वारन । जो पशु हौं तो कहा बस मेरो चरौं नित नन्दकी धेनु मँझारन ॥ पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यौ करछत्र पुरन्दर कारन । जो खग हौं तो बसेरो करौं वहि कालिंदी-कूल कदम्बकी डारन ॥ [ १७३ ] नाहींन आवत आन भरोसो । यहि कलिकाल सकल साधनतरु है श्रम-फलनि फरो सो ॥१॥ तप, तीरथ, उपवास, दान, मख जेहि जो रुचै करो सो । पायेहि पै जानिबो करम-फल भरि भरि वेद परोसो ॥२॥ आगम बिधि जप-जाग करत नर सरत न काज खरो सो । सुख सपनेहु न जोग-सिधि-साधन, रोग बियोग घरो सो ॥३॥ काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह मिलि ग्यान विराग हरो सो । बिगरत मन संन्यास लेत जल नावत आम घरो सो ॥४॥ बहु मत मुनि बहु पंथ पुराननि जहाँ-तहाँ झगरो सो । गुरु कह्यो राम भजन नीको मोहिं लगत राज-डगरो सो ॥५॥