विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ विनय-पत्रिका तुलसी बिनु परतीति प्रीति फिरि-फिरि पचि मरै मरो सो । रामनाम-बोहित भव सागर चाहै तरन तरो सो ॥६॥ शब्दार्थ—आगम = शास्त्र । सरत = पूरा होता है । नावत = डालनेसे । आम = कच्चा । धरो = घड़ा । डगरो = मार्ग । बोहित = नौका । भावार्थ—मेरे मनमें (केवल रामजीको छोड़कर) दूसरेका भरोसा होता ही नहीं। इस कलिकालमें सब साधन वृक्ष-से हैं, जिनमें परिश्रमरूपी फल लगे हैं॥१॥ तप, तीर्थ, उपवास, दान, यज्ञ आदि जो जिसे रुचे, वह उसे करे। किन्तु कर्म- फल प्राप्त होनेपर ही जान पड़ेगा कि वेदोंने (केवल) भर-भरकर परोसा है; अर्थात् इस कलिकालके प्रभावसे तप, तीर्थ आदि सब साधनोंमें विघ्न पड़ जाता है, सफल नहीं होते— अतः साधकको परिश्रम तो बहुत करना पड़ता है किन्तु विघ्न पड़ जानेके कारण मजदूरी बहुत कम मिलती है ॥२॥ शास्त्रोंकी बतायी हुई विधिसे मनुष्य जप और यज्ञादि कर्म करता है, पर उनसे काम पूरा नहीं होता, वे खरे नहीं उतरते । योग-सिद्धिके साधनोंमें स्वप्नमें भी सुख नहीं है । उनमें रोग और वियोग धरा हुआ-सा है ॥३॥ काम, क्रोध, मद, लोभ और मोहने मिलकर ज्ञान-वैराग्यको हर-सा लिया है। और संन्यास लेनेपर मन वैसे ही बिगड़ जाता है जैसे पानी डालनेसे कच्चा घड़ा ॥४॥ पुराणोंमें मुनियोंके बहुत-से मत हैं और बहुत-से पन्थ। उनमें जहाँ-तहाँ झगड़ा-सा ही जान पड़ता है। अर्थात् कोई कुछ कहता है और कोई कुछ। मेरे गुरुने कहा कि रामजीका भजन करना अच्छा है और मुझे भी वह राजमार्ग-सा प्रतीत हो रहा है ॥५॥ तुलसीदास कहते हैं कि जिसे विश्वास और प्रेमके बिना बारम्बार पचकर मरना हो, वह मरे; किन्तु संसार-सागरसे पार होनेके लिए रामजीका नाम जहाजके समान है; जो लोग पार उतरना चाहें, वे उसपर चढ़कर पार हो जायँ ॥६॥ विशेष १—'बिगरत मन संन्यास लेत'—संन्यासमार्ग तलवारकी धार है। उस- पर बड़ी सावधानीसे चलना पड़ता है। जरा भी चूके कि गये। फिर तो कहीं भी ठौर नहीं मिल सकता । इसलिए जबतक पूर्ण रीतिसे इन्द्रियोंका दमन न हो जाय, संसारसे स्वाभाविक ही विराग न उत्पन्न हो जाय, तबतक संन्यास लेना लाभदायक नहीं बल्कि घातक और अनिष्टकर है ।