विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २९९ [ १७४ ] जाके प्रिय न राम-वैदेही । तजिये ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम सनेही ॥१॥ तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषन बन्धु, भरत महतारी । बलि गुरु तज्यो, कन्त ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी ॥२॥ नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं । अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं ॥३॥ तुलसी सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रान ते प्यारो । जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो ॥४॥ शब्दार्थ—कन्त = पति । बनितन्हि = स्त्रियाँ । सुसेव्य = पूज्य, सेवा करने योग्य । भावार्थ—जिसे राम-जानकी प्रिय न हों, उसे करोड़ों शत्रुओंके समान छोड़ देना चाहिये—चाहे वह अत्यन्त स्नेही क्यों न हो ॥१॥ (देखिये न) प्रह्लादने अपने पिताको, विभीषणने अपने भाई रावणको, भरतने अपनी माताको, राजा बलिने अपने गुरु (शुक्राचार्य) को और व्रजांगनाओंने अपने-अपने पतियोंको त्याग दिया था । (और इस प्रकार स्वजनोंके त्यागनेसे वे बुरे नहीं कहे जाते बल्कि) वे आनन्ददायक और कल्याणकारी माने जाते हैं ॥२॥ जितने सुहृद् और पूज्य हैं, वे सब रामजीके ही नाते और स्नेहसे माने जाते हैं । बहुत-सा कहाँतक कहूँ, (इतना ही समझ लो कि) यह अंजन ही क्या (किस काम), जिससे आँखें फूट जायें ? ॥३॥ तुलसीदासका कथन है कि सब प्रकारसे परम हितू, पूज्य और प्राणसे भी बढ़कर प्यारा वही है जिससे (जिसके द्वारा) रामजीके चरणोंमें प्रेम हो । बस, यही हमारा मत है ॥४॥ विशेष १—‘बलि गुरु तज्यो’—वामन भगवान्के तीन पैर पृथिवी माँगने पर शुक्राचार्यने बलिसे कहा कि दान न दो, इसमें छल है। किन्तु दृढ़प्रतिज्ञ बलिने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और अपने गुरु शुक्राचार्यको त्याग दिया । २—कहते हैं कि गोस्वामीजीने यह पद मीराबाईके पत्रका उत्तर देनेके