विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० विनय-पत्रिका लिए बनाया था। मीराबाईने अपने घरवालोंसे तङ्ग आकर गुसाईंजीके पास निम्नलिखित पद्यात्मक पत्र भेजा था :— ‘स्वस्तिश्री तुलसी गुनभूषन, दूषन हरन गुसाईं। बारहिं बार प्रणाम करौं अब हरहु सोक-समुदाई ॥ घर के सजन हमारे जेते सबनि उपाधि बढ़ाई। साधु-सङ्ग अस भजन करत मोहि देत कलेस महाई ॥ बालपने ते मीरा कीन्ही गिरिधरलाल मिताई। सो तौ अब छूटत नहिं क्यों हू लगी लगन बरियाई ॥ मेरे मातु पिताके सम हो हरि भक्तन सुखदायी। हमको कहा उचित करिबो है सो लिखिये समुझाई ॥’ इस पत्रके उत्तरमें गोस्वामीजीने मीराके पास ‘जाके प्रिय न राम बैदेही’ यह पद लिखकर भेजा था। किन्तु पं० रामचन्द्र शुक्लने, तुलसी ग्रन्थावलीके तीसरे खण्डमें लिखा है कि ‘उपर्युक्त कथा बिलकुल निर्मूल मनगढ़न्त समझ पड़ती है। मीराबाईका गोलोक प्रयाण संवत् १६०३ में हो चुका था। उस समय गुसाईंजी अधिकसे अधिक १३ वर्षके रहे होंगे।’ यही बात ठीक भी जान पड़ती है। [ १७१ ] जौ पै रहनि राम सों नाहीं। तौ नर खर कूकर सूकर सम वृथा जियत जग माहीं ॥१॥ काम, क्रोध, मद, लोभ, नींद, भय, भूख, प्यास सब ही के। मनुज देह सुर-साधु सराहत, सो सनेह सिय-पी के ॥२॥ सूर, सुजान, सुपूत सुलच्छन गनियत गुन गरुआई। बिनु हरिभजन इँदारुनके फल तजत नहीं करुआई ॥३॥ कीरति, कुल, कूरतूति, भूति भलि, सील सरूप सलोने। तुलसी प्रभु-अनुराग-रहित जस सालन साग अलोने ॥४॥ शब्दार्थ—सलोने = लावण्यमय। सालन = कढ़ी। अलोने = बिना नमकका। भावार्थ—यदि रामजीसे लगन नहीं है, तो वह मनुष्य इस संसारमें गधे,