विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ | विनय-पत्रिका जीवको जीवन प्रान को प्यारो। सुखहू को सुख राम सो बिसारो ॥४॥ कियो करैगो तोसे खल को भलो। ऐसे सुसाहब सों तू कुचाल क्यों चलो ॥५॥ तुलसी तेरी भलाई अजहू बूझै। राढ़उ राउत होत फिरिकै जूझै ॥६॥ शब्दार्थ—हातो = पृथक् हुआ। फोकट = मुफ्तमें, व्यर्थ ही। सी = जानकीजी। राढ़उ = कायर भी। राउत = वीर। जूझै = लड़ता है। भावार्थ—रे नीच! तूने राम-सरीखे अच्छे स्वामीसे न तो स्नेह ही किया और न कोई नाता ही रखा। यद्यपि तूने उनका इतना निरादर किया, फिर भी उन्होंने तुझे नहीं छोड़ा ॥१॥ तूने मुफ्तमें नये-नये फीके नाते और स्नेह जोड़ लिये जो कि शरीरको जलानेवाले और जानके ग्राहक (मारने- वाले) हैं ॥२॥ अपना और अपने प्रियजनोंका भला सब लोग चाहते हैं, पर दोनोंके मूल कारण (कल्याण करनेवाले) दयालु जानकीनाथ ही हैं ॥३॥ तूने राम-सरीखे जीवोंके जीवन, प्राणोंके प्यारे और सुखोंके सुखको भुला दिया ॥४॥ उन्होंने तुझ-सरीखे खलका भला किया है और भविष्यमें भी करेंगे। ऐसे अच्छे स्वामीसे तूने कुचाल क्यों चली या उनके साथ बुरा बर्ताव क्यों किया ? ॥५॥ हे तुलसी! तेरे समझ जानेपर या चेत जानेपर अब भी तेरी भलाई हो सकती है। क्योंकि लड़ाईसे भागा हुआ कायर पुरुष भी जब वापस आकर लड़ता है, तो शूरवीर हो जाता है ॥६॥ [ १७७ ] जो तुम त्यागो राम हौं तौ नहिं त्यागौं। परिहरि पाँय काहि अनुरागौं ॥१॥ सुखद सुप्रभु तुम सो जग माहीं। श्रवन-नयन मन-गोचर नाहीं ॥२॥ हौं जड़ जीव, ईस रघुराया। तुम मायापति, हौं बस माया ॥३॥