भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 314

विनय-पत्रिका ३०३ हौं तो कुजाचक, स्वामि सुदाता। हौं कपूत, तुम हितु पितु-माता ॥४॥ जो पै कहुँ कोउ बूझत बातो। तौ तुलसी बिनु मोल बिकातो ॥५॥ शब्दार्थ—हौ = मैं। अनुरागों = प्रेम करूँ। कुजाचक = निकृष्ट, भिखमंगा। भावार्थ—हे रामजी ! यदि आप मुझे त्याग भी दें, तो भी मैं आपको नहीं छोड़ सकता। (आप ही बतायें कि) मैं आपके चरणोंको छोड़कर और किससे प्रेम करूँ? ॥१॥ संसारमें आपके समान सुख देनेवाले अच्छे स्वामी कान, आँख, मन, इन्द्रियोंके विषय नहीं हुए। अर्थात् आप सरीखा स्वामी मैंने न तो कानोंसे सुना है, न आँखोंसे देखा है, और न मनमें ही निश्चय होता है कि ऐसा कोई दूसरा स्वामी है ॥२॥ मैं मूर्ख जीव हूँ और आप ईश्वर हैं। आप मायापति हैं, और मैं मायाके अधीन हूँ ॥३॥ मैं निकृष्ट याचक (मंगन) हूँ, और आप स्वामी हैं, अच्छे दाता हैं। मैं, आपका कपूत हूँ और आप हित करनेवाले मेरे माता-पिता हैं ॥४॥ यदि कहीं कोई मेरी बात पूछता, तो मैं अर्थात् यह तुलसी दास बिना मोल उसके हाथ बिक जाता। तात्पर्य यह है कि यदि कोई मेरा ग्राहक होता, तो मैं आपको कष्ट न देता—उसीका हो जाता ॥५॥ [ १७८ ] भयेहूँ उदास राम, मेरे आस रावरी। आरत स्वारथी सब कहैं बात बावरी ॥१॥ जीवनको दानी घन कहा ताहि चाहिये। प्रेम-नेमके निबाहे चातक सराहिये ॥२॥ मीन तें न लाभ-लेस पानी पुन्य पीन को। जल बिनु थल कहा मीचु बिनु झीन को ॥३॥ बड़े ही की ओट बलि वाँचि आये छोटे हैं। चलत खरे के सङ्ग जहाँ-तहाँ खोटे हैं ॥४॥ यहि दरबार भलो दाहिनेहु-वाम को। मोको सुखदायक भरोसो राम-नाम को ॥५॥