भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 316

विनय-पत्रिका ३०५ जग जगदीस घर घरनि घनेरे हैं। निराधार के अधार गुनगन तेरे हैं ॥२॥ गजराज-काज खगराज तजि धायो को। मोसे दोस-कोस पोसे, तोसे माय-जायो को ॥३॥ मोसे क्रूर कायर कपूत कौड़ी आध के। किये बहुमोल तैं करैया गीध-स्राध के ॥४॥ तुलसी को तेरे ही बनाये, बलि, बनैगी। प्रभुकी विलंब-अंब दोष-दुख जनैगी ॥५॥ शब्दार्थ—अंगहीन = असहाय। घनेरे = बहुतसे। खगराज = गरुड़। जायो = पैदा किया है। भावार्थ—कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ, दीनकी कौन सुनता है ? तीनों लोकमें सब असहायोंकी गति एकमात्र आप ही हैं। ॥१॥ यों तो संसारमें घर-घरमें बहुतसे जगदीश हैं, पर निराधारके लिए आपके गुणोंका ही आधार है ॥२॥ गजेन्द्रकी रक्षाके लिए गरुड़को छोड़कर (पैदल) कौन दौड़ा था ? मेरे जैसे महा अपराधीका पोषण करनेवाला आप सरीखा पुत्र और किस माताने पैदा किया है ? ॥३॥ मेरे जैसे क्रूर, कायर, कपूत और आधी कौड़ीके मूल्यवालोंको आपने बहुमूल्य कर दिया। आप गीध जटायुका श्राद्ध करनेवाले हैं ॥४॥ बलिहारी ! आपहीके बनाये तुलसीकी बन सकेगी। हे प्रभो ! आपकी विलम्बरूपी माता दोष और दुःख पैदा करेगी। तात्पर्य यह है कि यदि आप मुझपर कृपा करनेमें देर करेंगे, तो वह देर ही मेरे लिए दोष और दुःख उत्पन्न करनेवाली जननी हो जायगी ॥५॥ विशेष १—'गजराज...धायोको'—गजेन्द्रकी रक्षाके लिए भगवान् पैदल ही दौड़े थे। ८३ वें पदके विशेषमें देखिये। २—'गीध-स्राधके'—२१५ वें पदके विशेषमें देखिये। [ १८० ] बारक बिलोकि बलि कीजै मोहिं आपनो। राय दसरथके तू उथपन-थापनो ॥१॥ २०