विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ विनय-पत्रिका साहिब सरनपाल सबल न दूसरो। तेरो नाम लेत ही सुखेत होत ऊसरो ॥२॥ वचन करम तेरे मेरे मन गड़े हैं। देखे सुने जाने मैं जहान जेते बड़े हैं॥३॥ कौन कियो समाधान सनमान सीला को। भृगुनाथ सो रिषी जितैया कौन लीला को ॥४॥ मातु-पितु-बन्धु-हित, लोक-वेदपाल को। बोल को अचल, नत करत निहाल को ॥५॥ संग्रही सनेहबस अधम असाधु को। गीध सबरी को कहौ करि है सराघु को ॥६॥ निराधार को अधार, दीन को दयालु को। मीत कपि-केवट-रजनिचर-भालु को ॥७॥ रंक निरगुनी, नीच जितने निवाजे हैं। महाराज ! सुजन-समाज ते विराजे हैं ॥८॥ साँची बिरुदावली न बढ़ि कहि गई है। सीलसिंधु ! ढील तुलसी की बेर भई है ॥९॥ शब्दार्थ-बारुक = एक बार । उथपन = उखड़े हुए । थापनो = जमानेवाले । सीला = शिला, अहल्या । निवाजे = कृपा की । भावार्थ-बलिहारी ! एक बार मेरी ओर देखकर मुझे अपना बना लीजिये । हे महाराज दशरथके लाल ! आप उखड़े हुएको जमानेवाले हैं ॥१॥ शरणागतों- को पालनेवाला सबल स्वामी (आपके अतिरिक्त) दूसरा कोई नहीं है । आपका नाम लेते ही ऊसर भी उपजाऊ खेत हो जाता है; अर्थात् आपके नामके प्रभाव- से मूढ़ हृदयमें भी भक्तिका उद्रेक उमड़ने लगता है ॥२॥ आपके वचन और कर्म मेरे मनमें गड़ गये हैं । संसारमें जितने बड़े-बड़े लोग हैं, सबको मैंने देखा, सुना और समझा है ॥३॥ शिला (अहल्या) को सम्मानपूर्वक शान्ति किसने दी ? परशुराम जैसे ऋषिको सहजहीमें जीतनेवाला कौन है ? ॥४॥ माता, पिता और भाईके लिए लोक तथा वेदोंकी मर्यादा पालनेवाला कौन है ? अपने शब्दोंपर दृढ़ रहनेवाला कौन है ? प्रणाम करनेवालेको निहाल करनेवाला