भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 318, कुल 475 में से

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पृष्ठ 318

विनय-पत्रिका ३०७ कौन है ? ॥५॥ स्नेहवश पापियों और असाधुओंका संग्रह करनेवाला कौन है ? कहिये तो सही, गीध और शबरीका श्राद्ध कौन करेगा ? ॥ निरवलम्बका अवलम्ब और दीनोंपर दया करनेवाला कौन है ? (यह सब करनेवाले) बन्दर, केवट, निशाचर और रीछके मित्र (श्रीरामजी) हैं—(दूसरा कोई नहीं) ॥७॥ हे महाराज ! आपने जितने कंगाल, मूर्ख और नीचोंपर कृपा की है, वे सब सन्त- समाजमें जा बैठे हैं ॥८॥ यह सब आपकी सच्ची बिरदावली है, जरा भी बढ़ा- कर नहीं कही गयी है । किन्तु हे शीलके समुद्र ! (यह जरूर कहूँगा कि) तुलसी- की बेर (आपकी ओरसे) ढिलाई हुई है ॥९॥ विशेष १—‘सीला’—अहल्या; ४३ वें पदके विशेषमें देखिये । २—‘गीध’—८३ वें पदके विशेषमें देखिये । ३—‘सबरी’—१०६ वें पदके विशेषमें देखिये । [ १८१ ] केहू भाँति कृपासिन्धु मेरी ओर हेरिये । मोको और ठौर न, सुटेक एक तेरिये ॥१॥ सहस सिलातें अति जड़ मति भई है । कासों कहौं, कौने गति पाहनहिं दई है ॥२॥ पद-राग-जाग चहौं कौसिक ज्यों कियो हौं । कलि-मल खल देखि भारी भीति भियो हौं ॥३॥ करम-कपीस वालि-बली-त्रास-त्रस्यो हौं । चाहत अनाथ-नाथ ! तेरी बाँह बस्यो हौं ॥४॥ महा मोह-रावन बिभीषन ज्यों हयो हौं । त्राहि, तुलसीस ! त्राहि, तिहूँ ताप तयो हौं ॥५॥ शब्दार्थ—हेरिये=देखिये । सुटेक=सहारा । कौसिक=विश्वामित्र । भियो हौं=डर गया हूँ । हयो=हुआ । भावार्थ—हे कृपासिन्धु ! आप किसी प्रकार मेरी ओर देखिये । मुझे दूसरा कोई ठौर नहीं है, एक आपहीका सहारा है ॥१॥ मेरी बुद्धि हजारों पत्थरके

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