विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ विनय-पत्रिका समान (पत्थरसे हजार गुना अधिक) जड़ हो गयी है। किससे कहूँ कि आपने किस प्रकारकी गति पत्थरको (अहल्याको) दी है ॥२॥ विश्वामित्रकी तरह मैं भी आपके चरणोंमें प्रेमरूपी यज्ञ करना चाहता हूँ। किन्तु कलिके पापरूपी दुष्टोंको देखकर मेरे हृदयमें गहरा भय पैदा हो गया है ॥३॥ मैं कर्मरूपी बन्दरोंके बली राजा बालिके त्राससे त्रस्त हूँ। अतः हे अनाथोंके नाथ ! मैं आपकी भुजाओंके सहारे (सुग्रीवकी भाँति) बसना चाहता हूँ ॥४॥ महा मोहरूपी रावण है और विभीषणकी तरह मैं हुआ हूँ। हे तुलसीके स्वामी ! त्राहि, त्राहि ! मैं तीनों तापोंसे तप गया हूँ (मेरी रक्षा कीजिये) ॥५॥ विशेष १—'पाहनहिं'—अहल्याको, ४३ वें पदके विशेषमें देखिये। [ १८२ ] नाथ ! गुनगाथ सुनि होत चित चाउ सो। राम रीझिबेको जानौं भगति न भाउ सो ॥१॥ करम, सुभाउ, काल, ठाकुर न ठाउँ सो। सुधन न सुतन न सुमन सुआउ सो ॥२॥ जाचौं जल जाहि कहै अमिय पिआउ सो। कासों कहौं काहू सों न बढ़त हियाउ सो ॥३॥ बाप ! बलि जाउँ, आपु करिये उपाउ सो। तेरे ही निहारे परै हारेहू सुदाउ सो ॥४॥ तेरे ही सुझाये सूझै असूझ सुझाउ सो। तेरे ही बुझाये बूझै अबुझ बुझाउ सो ॥५॥ नाम-अवलंबु-अंबु दीन मीन-राउ सो। प्रभुसों बनाइ कहौं जीह जरि जाउ सो ॥६॥ सब भाँति बिगरी है एक सुबनाउ सो। तुलसी सुसाहिबहिं दियो है जनाउ सो ॥७॥ शब्दार्थ-गाथ = समूह । सुआउ = अच्छी आयु । हियाउ = हिम्मत,साहस । बुझाये = समझाने से । अबुझ = अज्ञ । अंबु = जल । जनाउ = जना देना, बता देना ।