भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 32

विनय-पत्रिका २१ २—'सित सुमन हास'—नवरसके वर्णनमें साहित्यकारोंने हास्यका रङ्ग सफ़ेद लिखा है। यथाः— "स्वेत रङ्ग रस हास्य को, देव प्रमथपतिजास" । इसीसे गोस्वामीजीने इसकी उपमा सफ़ेद फूलोंसे दी है। ३—इस पदमें उत्प्रेक्षालङ्कार है। उत्प्रेक्षा नाम है तुलना, बराबरी या वैसी ही भावनाका। इसका लक्षण इस प्रकार हैः— सम्भावना स्यादुत्प्रेक्षा वस्तुहेतुफलात्मना । ................................................. प्रायोब्जं त्वत्पदेनैक्यं प्राप्तुं तोये तपस्यति ॥ —कुवलयानन्द अथवा—केशव औरहि वस्तुमें औरै कीजे तर्क। उत्प्रेक्षा तासौं कहैं जिनकी बुद्धि सम्पर्क ॥ देवी-स्तुति राग मारू ( १५ ) दुसह दोष-दुख दलनि, करु देवि दाया। विस्व-मूलाऽसि, जन-सानुकूलाऽसि, कर सूलधारिनि महामूलमाया १ तड़ित गर्भाङ्ग सर्वाङ्ग सुन्दर लसत, दिव्य पट भव्य भूषन बिराजैं। बालमृग-मंजु खञ्जन-विलोचनि, चन्द्रबदनि लखि कोटि रतिमार लाजैं रूप सुख-सील-सीमाऽसि, भीमाऽसि, रामाऽसि,वामाऽसिवरबुद्धिबानी छमुख-हेरंब-अंबासि, जगदंबिके, संभु-जायासि जय जय भवानी ॥३॥ चंड-भुजदंड-खंडनि, बिहंडनि महिष, मुंड-मद-भंगकर अंग तोरे। सुंभ निःसुंभ कुंभीस रन केसरिनि, क्रोध-वारीस अरि-वृन्द बोरे ॥४॥ निगम-आगम अगम गुर्बितवगुन-कथन, उर्विधर करत जेहि सहसजीह्वा देहि मा, मोहि पन प्रेम यह नेम निज, राम घनस्याम तुलसी पपीहा ॥५ शब्दार्थ—मूलासि = (मूल+असि) जड़ हो। महामूल माया = मायाको उत्पन्न